इतिहास लेखन वर्षों से चला आ रहा है। पिछले लेख में हमने हिंदी साहित्य के इतिहास दर्शन की बात की। इस लेख में हम हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन परंपरा की बात करेंगे। कि कैसे हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा गया? इस इतिहास को लिखने में किन-किन विद्वानों का अहम योगदान था? और हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के क्रम क्रम में किन विधाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा?
हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन का प्रारम्भ-
अगर हम हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में बात करते हैं तो सर्वप्रथम फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी का नाम सामने आता है। जिन्होंने ‘इस्तवार द ल लिट्रेतुर एंदुई ए एन्दुस्तानी’ लिखा। इन्होंने यह इतिहास ग्रंथ ‘फ्रेंच’ भाषा में लिखा। जिसमें उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को बताने का प्रयास किया। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में दूसरा नाम मौलवी करीमुद्दीन का आता है जिन्होंने ‘तजकिरा ए शुअराई हिंदी’ ग्रंथ को 1948 में उर्दू भाषा में लिखा।हिंदी भाषा में लिखा हुआ प्रथम इतिहास ग्रंथ महेश दत्त शुक्ल द्वारा लिखा गया ‘भाषा काव्य संग्रह’ है जो 1873 में प्रकाशित हुआ।
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन परंपरा में मिश्र बंधुओं ने ‘मिश्र बंधु विनोद’ नामक ग्रंथ लिखकर अहम योगदान अदा किया। मिश्र बंधु तीन भाई थे। जिनका नाम क्रमशः गणेश बिहारी, श्याम बिहारी और सुखदेव बिहारी था। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘मिश्र बंधु विनोद’ की रचना 1913 से लेकर 1934 तक के कालखंड में किया। इस ग्रंथ के प्रथम तीन भागों का प्रकाशन 1913 ईस्वी में हुआ जबकि चौथे भाग का प्रकाशन 1934 ईस्वी में हुआ। इस ग्रंथ में लगभग उन्होंने 5000 कवियों का जीवन परिचय दिया तथा उनके रचनाओं का भी परिचय दिया।
मिश्र बंधुओं का सबसे बड़ा योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने उन अज्ञात कवियों की खोज की जिनको इससे पहले जो हिंदी साहित्य इतिहास लेखन के ग्रंथ लिखे गए उन ग्रंथो में उन कवियों का कोई जिक्र नहीं था। इसलिए ‘मिश्र बंधु विनोद’ ग्रंथ इस बात में अहम हो जाता है कि उन्होंने उन अज्ञात कवियों को अपने ग्रंथ में जगह दिया जिनका पहले कभी किसी ने चर्चा नहीं किया था। इसलिए उनके ग्रंथ में कवियों की संख्या बढ़कर लगभग 5000 के करीब हो जाती है।
कवियों को उनके महत्व को देखते हुए मिश्र बंधुओ ने चार श्रेणियां बनाई। जिसमें उन्होंने उन कवियों का परिचयात्मक विवरण दिया। मित्र बंधुओ ने अपनी इतिहास लेखन के ग्रंथ में जार्ज ग्रियर्सन के बाद से चली आ रही कालाअनुक्रम पद्धति को ही ग्रहण कर अपने इतिहास ग्रंथ को कालाअनुक्रम पद्धति में लिखा। अर्थात लेखक के जन्म वर्ष को आधार बनाकर उन्होंने अपने इतिहास ग्रंथ को लिखा ना कि उनके नाम के पहले अक्षर को आधार बनाकर क्योंकि मिश्र बंधुओ से पहले जार्ज ग्रियर्सन ने कालाअनुक्रम पद्धति में हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन प्रारंभ कर दिया था। मिश्र बंधुओ ने आठ कालों में अपने इतिहास लेखन ग्रंथ को विभाजित किया।
डॉ नामवर सिंह ने मिश्र बंधुओ के ग्रंथ को ‘साहित्यिक पुनरुत्थान के लहर से प्रभावित प्रशंसनीय ग्रंथ माना है’ जबकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनके ग्रंथ को ‘कवि वृत्त संग्रह’ की संज्ञा दी है।
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के परंपरा में जिस ग्रंथ को सबसे बड़ा माइलस्टोन माना जाता है वह ग्रंथ है आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित हिंदी साहित्य का इतिहास जो 1929 ईस्वी में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रंथ का प्रकाशन हिंदी शब्द सागर के भूमिका ‘हिंदी साहित्य का विकास’ के नाम से नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा 1929 में प्रकाशित हुआ। इसके उपरांत इसको एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। इस ग्रंथ ने हिंदी साहित्य का स्पष्ट और तथ्यों से प्रमाणित हिंदी साहित्य का इतिहास प्रस्तुत किया।
इस ग्रंथ को लिखने के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने दार्शनिक तेन के विधेयवादी अवधारणा का प्रयोग किया था। विधेयवाद से हमारा सीधा सा तात्पर्य है कि हम जिस जगह या समाज या देश या राष्ट्र में रह रहे हैं वहां की जनता कैसी है? वह कैसा विचार रखती है? वह कैसा समाज चाहती है? आदि विषय वस्तु विधेयवादी विषय वस्तु कहलाते हैं।
इस ग्रंथ के माध्यम से आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के 900 वर्षों के इतिहास को प्रस्तुत किया है। जिसमें उन्होंने इस कालखंड के लगभग 1000 कवियों के कृतित्व और व्यक्तित्व का वर्णन बहुत ही सजकता और तथ्यों को ध्यान में रखकर किया है। इसलिए यह इतिहास ग्रंथ अत्यंत अहम और विश्वसनीय हो जाता है इस ग्रंथ में उन्होंने कवियों के व्यक्तित्व से ज्यादा उनके कृतित्व को महत्व दिया है। अर्थात उन्होंने कैसा लेखन कार्य अपने कालखंड में किया? उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ा? और उस समाज में कैसी नई चेतना आई? इन तमाम विषय वस्तुओं को पाठकों के समक्ष रखने का योग्य कार्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का काल विभाजन सर्वमान्य है। उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को चार कालों में विभक्त किया। पहले कालखंड को उन्होंने वीरगाथा काल या आदिकाल नाम दिया। दूसरे कालखंड को भक्ति काल या पूर्व मध्यकाल नाम दिया। तीसरे कालखंड को उन्होंने रीतिकाल या उत्तर मध्यकाल नाम दिया। और चौथे कालखंड को उन्होंने आधुनिक काल या गद्य का नाम दिया उन्होंने काल विभाजन को विक्रम संवत में किया।
उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रारंभ 1050 विक्रम संवत से माना है। जिस कारण उन्होंने 1050 से 1375 तक के कालखंड को आदिकाल कहा। 1375 से 1700 विक्रम संवत तक के कालखंड को उन्होंने भक्ति काल कहा है। 1700 विक्रम संवत से लेकर 1900 विक्रम संवत तक के कालखंड को उन्होंने रीतिकाल या उत्तर मध्य काल कहा और 1900 से लेकर अब तक के कालखंड को उन्होंने आधुनिक काल या गद्य काल कहा।
आपको यहां बताते चले की जो विक्रमी संवत है उसे गगोरिन कैलेंडर से 57 वर्ष अधिक माना जाता है। अर्थात अगर हमें 2025 में विक्रम संवत को प्राप्त करना है तो हमें 2025 में 57 वर्ष जोड़ना पड़ेगा यदि हम विक्रम संवत की बात करें तो यह 2082 विक्रम संवत चल रहा है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने चार अपभ्रंश भाषा में लिखी हुई रचनाओं तथा आठ देशभाषा में लिखी हुई रचनाओं को आधार लेकर अर्थात कुल 12 ग्रंथ को आधार ग्रंथ के रूप में लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने वीरगाथा काल का नामांकन नामकरण किया।
चार अपभ्रंश भाषा की रचनाएं हम्मीरपाल रासो, विजयपाल रासो, कीर्तिलता और कृतिपताका। विजयपाल रासो ग्रंथ की रचना नल्लसिंह ने की थी। हम्मीर रासो की रचना सारंगधर की थी।
आठ देश भाषा के ग्रंथ-
- पृथ्वीराज रासो- चंद्रवरदाई
- बीसलदेव रासो- नरपति नाल
- परमाल रासो- जगनिक
- खुमान रासो- दलपति
- विजय जस चंद्रिका- मधुकर
- पदावली- विद्यापति
- जय चंद्र प्रकाश- भट्ट केदार
- अमीर खुसरो की पहेलियां और मुकरियाँ
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