समीक्षा- कोसी का घटवार ~शेखर जोशी

कोसी का घटवार कहानी शेखर जोशी द्वारा लिखी गई है। यह कहानी 1958 में प्रकाशित हुई। कोसी का घटवार पूर्वदिप्ति शैली में लिखी गई एक आंचलिक कहानी है।

कहानी में मुख्य पात्र गोसाई और लछमा है।

यह एक अधूरी प्रेम कहानी है जिसे हम चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ के समकक्ष रख सकते है।दोनों कहानियों के कुछ अंश एक दूसरे से मिलते हैं। दोनों कहानियों में प्रेम का विफल रूप दिखता है,परंतु प्रेम की भावना और संवेदना बहुत गहरी है। दोनों कहानियों में पुरुष पात्र प्रेम में संपूर्ण समर्पण करते दिखाई देते है।

शेखर जोशी ने कोसी का घटवार कहानी में अधूरे प्रेम को चित्रित किया है, जो निश्चल है लेखक ने कही भी प्रेम शब्द का प्रयोग नहीं किया है और ना ही कहानी में उनकी आंखे मिली न दोनों ने कभी एक दूसरे को छुआ है परंतु फिर भी यह प्रेम की एक अद्भुत कहानी के रूप में प्रसिद्ध है। जिसमें किसी प्रकार का कोई छल कपट नहीं है। दोनों समाज द्वारा बनाए गए नियमों को निभा रहे है।

कोसी का घटवार कहानी की मूल संवेदना-

गुसाई फ़ौज में था। सेनानिरावृति के 15 वर्ष बाद वापस वह अपने गांव लौटा तो उसके साथ उसका अकेलापन भी साथ आया उसने अपना अकेलापन दूर करने के लिए कोसी घाट के किनारे एकपनचक्की से लोगों के गेहूं पीसने का काम शुरू किया। गुसाई का एकांत इतना गहरा है कि उसे चक्की के निचले हिस्से की ‘छच्छिर-छच्छिर’ की आवाज़ के साथ पानी को काटने वाली मथनी की आवाज बहुत धीमी लगती है।

जब वह पानी में चलता है तो उसके ही पैर की आवाज छप छप छप.. खपर से गिरने वाले दाने की किट किट किट उसे सुनाई देती है। यही आवाजें उसके एकांत जीवन में एकमात्र सहारा बनी है। कहानी में लेखक ने एक जगह सूखी नदी का वर्णन किया है जो गोसाई के ही एकांत जीवन के प्रतीक के रूप में उभर कर आती है एक समय ऐसा होगा जब वह नदी भरी पूरी होगी उसी प्रकार जब उसके जीवन में लछमा थी वह भी अपने जीवन में सुखी था परंतु अब उसका अकेलापन उसे काटने दौड़ता था।

गुसाई के पास अपना सुख दुख बांटने के लिए कोई नहीं है। पनचक्की के यहां आते व्यक्ति को जब वह दूर से मना कर देता है तब बाद में इस बात का अफ़सोस करता है कि वह व्यक्ति यहां आता तो कुछ देर उस से बातचीत कर के अपने अकेलेपन से छुटकारा पा सकता था। उसका अकेलापन उसे जीने नहीं देता उसे रह रह कर 15 वर्ष पूर्व प्रेमिका (लछमा) की याद सताती है। अचानक उसे लछमा द्वारा किया वादा भी याद आता है जहां लछमा उसके साथ जीवन यापन की कसम खाती है।

गुसाई बचपन से ही अनाथ है जिस कारण लछमा के पिता उसकी शादी उससे नहीं करते है। इसके विपरीत गुसाई के यूनिट में ही भर्ती सिपाही रामसिंह से लछमा की शादी तय कर देते है। जब उसे इस बात का पता चलता है तब से ही वह अपने गांव वापस नहीं लौटता। लेकिन सेनानिवृत्ति के बाद जब वह लौटता है तब भी उसे लछमा की ही याद आती है। गुसाई के जीवन में उसका अपना कोई नहीं है। उसके जीवन का एकांत उसके दरवाजे पर सदैव के लिए उपस्थित हो गया है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब लछमा कोसी घाट पर आती है। जब गुसाई लछमा की आवाज को पहचान लेता है लेकिन पुनः जांच के लिए उसे एक झलक देखता है।अचानक गुसाई को देख कर वर्षों से जो भावनाओं को लछमा दबाए बैठी थी, वे भावनाएं गुसाई को सामने देख कर बह आती हैं । उसकी आंखों से आंसू की बूंदे बहने लगती है। गुसाई का ध्यान उसके सुने गले पर जाता है,और वह अनुमान लगा लेता है कि लछमा विधवा है परंतु वह लछमा से कोई प्रश्न नहीं करता।

बाल विधवा लछमा जो पति के मृत्यु के बाद अपना जीवन अत्यंत ग़रीबी से निर्वहन करती है,उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वह ठीक से अपने एकमात्र बेटे को रोटी तक नहीं खिला पाती। जब गुसाई लछमा के साथ उसके बच्चे को देखता है। तब वह आटा गूंथकर रोटी बनाने लगता है तभी लछमा गुसाई के हाथ से आटा लेकर खुद रोटी बनाने लगती है।

आटे की लोई बनाते समय लछमा के छोटे छोटे से हाथ जब तेजी से घूमते है तो कलाई में पहने चांदी के कंगन खन-खन की आवाज करते है तब गुसाई को पता लगता है कि चक्की,मथनी और काठ की चिड़िया का स्वर कितना नीरस है और खन-खन की आवाज कितनी मधुर है। गुसाई इस आवाज को पहली बार अनुभव करता है। जब गुसाई रोटी उसके बच्चे को देता है तब लछमा गुसाई से लाज से बचने के लिए झूठ कहती है, कि रोटी तो वो बनाके रख आईं है और बच्चा उसकी बात झूठ बता देता है।

लेखक ने यहां समाज के निर्दयी होने की ओर इशारा किया है, कि किस तरह एक विधवा जो आर्थिक रूप से कमजोर है उसे एक वक्त की रोटी तक नसीब नहीं होती और समाज के वही लोग उसकी मदद के लिए हाथ तक नहीं बढ़ा पाते। गुसाई उसकी आर्थिक हालत भाप लेता है और उसकी ओर सहायता के लिए हाथ बढ़ाता है लेकिन लछमा उसकी सहायता लेने से इनकार कर देती है शायद उसे इस सहायता के बदले कही न कही समाज के लांछन का डर सता रहा हो। फिर भी गुसाई लछमा से छुप के उसके आटे में अपना निजी आटा मिला देता है।

जब गुसाई उसकी सहायता करने के लिए कुछ पैसे देता है तो लछमा उसे लेने से इनकार कर देती है और कहती है कि जैसे तैसे उसका घर चल जाता है वह तर्क देती हुई कहती है कि पेट घट के खप्पर की तरह है उसमें जितना डालो कम ही होता है। इसके बाद वह कहती है कि गंगनाथ अगर साथ रहे तो बुरे दिन भी कट ही जाते हैं ।

जब लछमा गंगनाथ का नाम लेती है तब गुसाई ये जान लेता है कि लछमा अब पूर्व की बात भूल चुकी है वह अपने जीवन में आगे बढ़ चुकी है। गुसाई उसे पिसान पीस जाने की सूचना देकर बांध की ओर जाता है। वह जब वापिस लौटता है तब तक लछमा वहां से जा चुकी होती है। वह पहाड़ की पगडंडी पर जाती लछमा को तब तक देखता रहता है जबतक उसकी परछाई गायब नहीं हो जाती। गुसाई का एकांत जो कुछ क्षण के लिए लछमा के आने से गायब हो जाता है। अब वह अकेलापन जिंदगी-भर साथ देने के लिए उसके द्वार पर पुनःबैठ गया है।

लेखक ने दोनों मुख्य पात्रों में अनुभव की गहरी संवेदना को दर्शाया है। दोनों ही समाज के बंधनों में बंधे है। उनके सामने समाज की मर्यादा निभाने की चुनौती भी है और आपसी प्रेम की असहनीय पीड़ा भी।

शेखर जोशी ने कहानी में पहाड़ी जीवन–यापन को दर्शाया है। आंचलिकता का हाथ थामे कहानी अपनी तीव्र गति से आगे बढ़ती है। लेखक ने कहानी के अंत को पाठक वर्ग पर छोड़ दिया है कि वह जैसे चाहे कहानी का अंत सोच सकता है।

इसकी भाषा शैली सहज,संवेदनशील और मार्मिक है। इसके साथ–साथ यह ग्रामीण परिवेश से जुड़ी है। जो इसकी भाषा को पाठक वर्ग के हृदय में सीधे प्रवेश कराती है। कहानी के शुरूआत में ही पुर्वदीप्ति शैली का प्रयोग किया गया है,जो घटनाक्रम और पात्रों के अतीत को वर्तमान से जोड़कर दिखाता है।
इस कहानी के पात्रों के संवाद की बात करे तो इसका संवादहीन रह जाना ही इसकी मुख्य विशेषता है।

जैसे कि गुसाईं का लछमा से कहना “लछमा… कभी चार पैसे जुड़ जाएं, तो गंगनाथ का जागर लगाकर भूल-चूक की माफी मांग लेना। पूत-परिवारवालों को देवी-देवता के कोप से बचा रहना चाहिए।”
यह संवाद गुसाईं के मन की बात है जो लछमा के प्रति उसके निश्चल प्रेम और उसकी चिंता को दर्शाता है, लेकिन वह सीधे कह नहीं पाता और उसे धार्मिक अनुष्ठान की बात कहकर टाल देता है।

निशा मंडल
परास्नातक
हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय

समीक्षा, परिंदे~ निर्मल वर्मा…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%b0/

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