साहित्य मुख्यतः दो विधाओं में रचा जाता है। जिसे हम गद्य और पद्य कहते हैं गद्य में कहानी नाटक उपन्यास आदि विधा आती हैं जबकि पद्य में प्रबंध, मुक्तक, कविता, गीत, प्रगीत, लंबी कविता आदि आते हैं। छंद का संबंध पद्य से है। अगर हम इसको सरल शब्दों में कहें तो पद्य की रचना छंद में होती है।
छंद शब्द का मूलतः दो अर्थ निकलते हैं पहले अर्थ का मतलब है आवरण या ढकना और दूसरा है प्रवाह। छंद के माध्यम से रचना को इस प्रकार बांधा जाता है कि वह बिखरने न पाए अर्थात रचना के भाव में किसी प्रकार का बिखराव ना हो। इसके साथ ही छंद का दूसरा अर्थ यह भी है कि रचना का पाठ करते समय उसका लय और परवाह न टूटे। इन्हीं दो परिस्थितियों को बनाए रखने के लिए हम छंद का प्रयोग करते हैं।
भारतीय छंदशास्त्र का उद्भव वैदिक साहित्य से माना जाता है। वैदिक साहित्य में छंदोंबध्दता है लेकिन उसमें छंदों का शास्त्रीय गणना का नहीं दिखता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी छंदों का संक्षिप्त निरूपण है।
यति यति का मतलब होता है रुकना। जब हम किसी छंद का पाठ करते हैं। तो उस छंद में कुछ जगह ऐसे होते हैं जहां पहुंचकर हमें रुकना होता है जैसे- जब हम किसी गद्य के वाक्य को पढ़ते हैं। जब वह वाक्य पूरा हो जाता है। तो हम वहां पर अल्पविराम या पूर्ण विराम का प्रयोग करते हैं, और वहां रुकते हैं। छंद में वाक्य गद्य की भांति पूरा नहीं होता। लेकिन हमें ध्यान रखना होता है की कहां पर रुकने से छंद का प्रवाह या लय नहीं टूटेगा वहां पर हम यति का प्रयोग करते हैं। अर्थात जहां रुकना आवश्यक हो वही रुकते हैं।
गति गति यति का उल्टा है परंतु चांद में गति और यदि एक साथ रहते हैं अगर चांद में कोई यकीन ना है तो तो उसको बिना रुके पढ़ने से एक गति का निर्माण होता है और चांद में ले का निर्माण होता है चांद में ले के साथ एक प्रवाह बनता है इसी प्रवाह को हम गति कहते हैं।
लय गति और यति के उचित मेल से जो गुण उत्पन्न होता है उसे लय कहते हैं। लय के कारण ही किसी कविता के पाठ को सुनने में मन को बहुत आनंद मिलता है।
छंद के प्रकार
मात्रा और वर्ण के आधार पर, छंद के दो प्रकार किए गए हैं। मात्रा के व्यवस्थित प्रयोग से जो छंद बनते हैं उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। और वर्णों के व्यवस्थित प्रयोग से जो छंद बनते हैं उन्हें वर्णिक छंद कहा जाता है।
अधिकतर ऐसा ही होता है कि कवि एक ही छंद में पूरी कविता की रचना कर देता है। लेकिन जब कविता की रचना करते समय कवि एक छंद के नियम का पालन न करें तो ऐसी रचना को मुक्त छंद की रचना कहा जाता है। अर्थात कविता में भीतर ही भीतर चलने वाली लय को बनाए रखते हुए रचना की जाए तो ऐसी रचना मुक्त छंद की रचना होती है। मुक्त छंद का आशय छंद का त्याग नहीं इसलिए छंद मुक्त कविता न कहकर मुक्त छंद की कविता कहां जाता है। इसमें कवि कविता के भाव और अभिव्यक्ति के अनुरुप छंद को चुनता है अर्थात वह किसी एक पूर्व निर्धारित छंद के नियम को नहीं अपनाता। निराला की रचना ‘जूही की कली’ मुक्त छंद का सुंदर उदाहरण।
आज के युग में जब हमें किसी की तारीफ करनी हो तो हम उसको कुछ प्रतीक और बिंबो से नवाजते हैं कि तुम्हारे बाल ऐसे हैं तुम्हारी आंखें ऐसे हैं आदि वैसे ही साहित्य जगत में कविता की व्याख्या और सराहना करने के लिए बिम्ब और प्रतीक का व्यवहार करना आधुनिक युग के आलोचकों ने शुरू किया। अब आज के समय मे अलंकारों की अपेक्ष कविता में बिंब और प्रतीक के उपयोग को समझना अति आवश्यक लगता है। इसके कुछ मुख्य लक्षण हैं। वर्तमान अथवा आधुनिक युग का कवि अपनी कविता में ज्यादा अलंकारों का प्रयोग कर उसको सजना अथवा दिखाना नहीं चाहता। वह उस कविता को अपने व्यक्तिगत अनुभव, पूर्ण यथार्थ, सजीवता और जटिलता आदि के माध्यम से पूरी कविता को सुंदर प्रभावी बनाना चाहता है। वह अपनी कविता में आधुनिक बोध भरना चाहता है। आज के दौर की समस्याओं को रेखांकित करना चाहता है। आज के दौर में व्यक्ति के भीतर क्या व्यक्तिगत मनोभाव चल रहे हैं? समाज के प्रति उसका क्या दृष्टिकोण है? आदि सभी भाव विचार और दर्शन को संजीव और जीवंत रूप में दिखाना चाहता है।
किंतु ऐसा नहीं है कि पुराने कवि अनुभव की सजीवता और जटिलता की चिंता नहीं करते थे। पुरानी कविता में भी ये गुण पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं। किंतु पुराने कवि कविता की व्याख्या करते समय अलंकारों का प्रयोग करके कविता को सुंदर बनाने पर अधिक ध्यान देते थे । आजकल या आधुनिक समय के पाठक, विद्वान और आलोचक कविता की सजीवता और यथार्थ पूर्णता को अधिक मान्यता देते हैं। मूल रूप में कहा जा सकता है- आधुनिक समय के कवि का दृष्टिकोण सौंदर्यवादी की जगह जीवनवादी अधिक है। यही मुख्य कारण है कि कविता में बिंब का महत्त्व उत्रोत्तर बढ़ गया है।
ऐसा माना जाता है कि बिंब संवेदन से जुड़े होते हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता ‘ऐंद्रियता’ होती है। यही वजह है कि सुंदरता से अधिक सजीवता बिंब का प्रधान गुण है। अलंकार में सजीवता हो सकती है लेकिन उनके प्रयोग का प्रधान उद्देश्य कविता में सौंदर्य लाना होता है। ठीक उसी प्रकार बिंब में सौंदर्य हो सकता है, लेकिन उसका काम कविता को सजीव बनाना है।
निष्कर्ष-
अतः हम कह सकते हैं कि छंद पद्य का बहुत ही आवश्यक अंग है। जो कविता को लय और तुक में बांधकर एक सुंदर आकर देती है।
रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्व …https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a5%82/
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