समीक्षा, परिंदे~ निर्मल वर्मा

परिंदे, निर्मल वर्मा द्वारा रचित एक प्रसिद्ध यद्यपि आरम्भिक कहानी है। यह कहानी पूर्व दीप्ति शैली (फ्लैशबैक शैली), प्रतीकात्मक शैली तथा मनोविश्लेषणात्मक शैली के गुंफन से अपना आकार ग्रहण करता है। परिंदे कहानी सर्वप्रथम हंस पत्रिका में सन् 1957 में प्रकाशित हुई बाद में 1960 में प्रकाशित परिंदे कहानी संग्रह में यह प्रतिनिधि कहानी की तौर पर शामिल हुई।

इस कहानी का महत्व इन अर्थ में समझा जा सकता है कि हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने परिंदे कहानी को नई कहानी की पहली रचना माना है क्योंकि परिंदे में कहानी कला के प्रचलित ढांचे को तोड़ कर एक नया विधा रचा। नई कहानी के दौर में निर्मल वर्मा प्रसाद की कहानी काव्यात्मक संवेदना की परंपरा को आगे लाते हैं।

निर्मल वर्मा की कहानियां माहौल की, वातावरण की, मूड की, मन:स्थिति की कहानियां हैं। बाहरी दुनिया के घात प्रतिघातों की कहानी नहीं बल्कि व्यक्ति के मन की आंतरिक उथल-पुथल को बहुत ही सहज और सूक्ष्म तरीके से व्यक्त करती है।

इस कहानी में लेखक ने यूं तो एक व्यक्ति के मन की कहानी को व्यक्त किया है। कहानी का मुख्य पात्र लतिका है। जिसके इर्द-गिर्द कहानी बुनी गई है। हालांकि कहानी के पूरे जटिल वितान को समझने के लिए दो अन्य पत्र डॉक्टर मुखर्जी तथा मिस्टर ह्यूबर्ट की सृष्टि की गई है। एक पहाड़ी कान्वेंट स्कूल में लतिका अध्यापिका है और हॉस्टल की वार्डन है। ह्यूबर्ट संगीत का अध्यापक है और डॉक्टर मुखर्जी वहां बतौर डॉक्टर कार्यरत है।

यह कहानी न तो पात्र प्रदान है न ही घटना प्रधान। इस आधार पर लतिका इस कहानी की मुख्य पात्र कहा जा सकता है लेकिन वास्तव में आदि से अंत तक इस कहानी में मौजूद विद्यमान रहने वाली वह कहानी के विचार को एक स्तर पर वहन करने वाली लेकिन बाकी स्तरों पर दोनों पात्रों का योग लेकर चलने वाली एक पात्री है जिसे नायिका इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्योंकि अंत में कहानी का फल लतिका से जुड़ा हुआ नहीं है।

अमूर्त सवाल कविता के लिए महत्वपूर्ण लेकिन कहानी में बहुधा प्रयोग हुआ है। ये महत्वपूर्ण विषय जैसे सौंदर्य, ईश्वर, मृत्यु, जीवन का अर्थ, जीवन की दुविधा, निर्णय के क्षण इन प्रश्नों को लेकर चलने वाली कहानियों में प्रायः एक भावनात्मक एकाग्रता, आकुलता, बेचैनी, उदासी और इनका सम्मिलित माहौल अवश्य उपस्थित रहता है।

इस कहानी पर अस्तित्ववाद का गहरा प्रभाव है जिसके केंद्र में मृत्युबोध, निरर्थकताबोध, अकेलापन व अलगाव की भावना जिसे लतिका, ह्यूबर्ट व डॉक्टर मुखर्जी जैसे चरित्रों में अलग-अलग रूपों में समान भावना देखे जा सकती है। प्रतिबोध एक ऐसा अनुभव है जो जीवन के अर्थ को संदिग्ध बना देता है।

ह्यूबर्ट जो संगीत का अध्यापक है और जिसे इस बात का भान है कि वह एक असाध्य रोग से पीड़ित है और मृत्यु उसके जीवन के दहलीज पर उसको अपने आगोश में भर लेने के लिए बेसब्र खड़ी यहै जिसे लेखक प्रतीकात्मक रूप से कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है कि “पियानो के बजाते समय गिरता हुआ पास एक छोटी सी मौत है।”

लतिका अपने दिवंगत प्रेमी कैप्टन गिरीश नेगी के मधुर स्मृतियों में अपने हृदय को विदीर्ण किए जा रही वर्तमान में रहते हुए भी उससे बेखबर, भविष्य के प्रति नैराश्यबोध, अनासक्त अपने जीवन को सुबह से शाम तक की मात्रा दिनचर्या तक ही सीमित रह गया है। उसे अपने जीवन में प्रेरक शक्ति के रूप में कुछ भी नहीं नजर आता वह अतीतजीवी बन गई है जो उसके भावनात्मक मृत्यु का परिचायक है।

वह अपने दिवंगत प्रेमी कैप्टन गिरीश नेगी की अव्यक्त प्रतीक्षा करती है यह जानते हुए भी कि वह अब कभी नहीं आएगा लतिका के मन में इसकी स्मृतियां जीवंत है उसके जाने का दुख भले ही समय बीतने के साथ कुछ काम पड़ गया हो हल्का पड़ गया हो लेकिन ऐसा लगता है जैसे उसने स्वयं ही यह ठान लिया है और वह अपने सूखते घाव को स्वयं छील-छीलकर उस पर पपड़ी नहीं पड़ने देती वह उसे हरा रखना चाहती है क्योंकि उसे अनुभव होता है कि इसी घाव की वजह से उसके जीवन की सार्थकता, गहराई, एक भावनात्मक मूल्य बाकी है।

अपनी दुर्बलता को वह अपने जीवन का अर्थ का नाम देती है। ह्यूबर्ट और लतिका के मध्य में डॉक्टर मुकर्जी एक तुला की संतुलन की तरह है। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय वर्मा में भयंकर त्रासदी देखी जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी को खोया उन्होंने मकान को ताश के पत्तों की तरह ढहते देखा मृत्यु की विभीषिका से निकल आने तक उसे सचमुच में जान लेने के बाद उन्होंने इस तरह जीने का फैसला किया जैसा की एक डॉक्टर ही जी सकता है। डॉक्टर मुखर्जी में एक तरह की लापरवाही है जो जीवन जैसे आएगा वैसे जीया जाएगा।

कहानी के कथानक पर दृष्टिपात करें तो कहानी का कान्वेंट स्कूल के आखिरी दिन की कहानी है। जिसके बाद एक लंबी सर्दियों की छुट्टियों का अंतराल आने वाला है जिसके लिए सभी हॉस्टल की लड़कियां अपने घर जाने का प्रबंध कर चुकी है। लेकिन कान्वेंट की प्रथा के अनुसार छुट्टी से पहले चैपल में प्रेयर व संगीत तत्पश्चात् पिकनिक की परंपरा का संपन्न होती है। इससे पहले अपनी किशोरी छात्रा जूली के नाम का प्रेम पत्र आया है।

जो हॉस्टल की वार्डन के हाथ लग गया है जिससे वह खीझ उठी है। वह पत्र जूली को नहीं देती है बाद में वह विचार करती है कि क्या वह अपने प्रेम के अभाव का बदला प्रेम पत्र प्राप्त किशोरी जूली से ले रही है?

पिकनिक की घटना कहानी का विस्तार रचती है लड़कियों के खेल में “व्हाट डू यू वांट” इस प्रश्न का बृहत्तर अर्थ में प्रतिध्वनित होता है। व्हाट दो यू वांट, जीवन में हमको क्या चाहिए? मनुष्य जिंदगी से क्या अपेक्षाएं रखता है और क्यों? इस कहानी के बीच में एक और प्रश्न बार-बार जन्म लेता है परिंदों की कतारें उड़ती जा रही है, इसके साथ जुड़ा हुआ प्रश्न उठता है कि हम कहां जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल कहानी के पात्रों तक ही सीमित नहीं। आते तो यह पाठकों से भी किया गया प्रश्न है कि हमारे जीवन का लक्ष्य आखिर क्या है? मृत्यु विभिन्न रूपों में अनुभवों में इसलिए यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

परिंदे कहानी शब्दों से परे जाकर अनुभव का संयोजन कर एक नई सृष्टि करती है। इसलिए शब्दों में जो घटनाएं गूंथी गई है क्योंकि इसमें प्रायः घटनाएं ही नहीं है और इस कहानी के पात्रों या चरित्र का घटनाओं से कुछ टकराहट ही नहीं है इसलिए कहानी पढ़कर एक स्थूल निचोड़ या निष्कर्ष या अर्थ तक पहुंचना संभव नहीं है।

निर्मल की कहानी का रूप उनके कथ्य को अपनी भावनात्मक सुंदरता से अपने रोमांस से प्राकृतिक माहौल बिंबों से इस तरह आच्छादित कर लेता है कि प्राय: उसकी संरचना हमें समझ में नहीं आती। उनकी लगभग सभी कहानियों के मूल में एक प्रश्न है और इस प्रश्न को वे अनेक कोणों से देखते हैं। इस अर्थ में परिंदे एक त्रिकोणात्मक कहानी कहा जाएगा।

केवल पात्रों की दृष्टि से ही नहीं बल्कि उनके द्वारा उठाए गए प्रश्नों, उन प्रश्नों के अर्थों उनके पक्षों के संदर्भ त्रिकोण है। डॉक्टर मुखर्जी के भीतर अतीत के प्रति असम्पृक्ति है और वर्तमान के प्रति सम्पृक्ति, दूसरी ओर लतिका है जिसके जिसमें अतीत के प्रति गहरी आसक्ति है कि वर्तमान से वह बिल्कुल असम्पृक्त हो गई है और भविष्य उसके लिए कोई अस्तित्व नहीं रखता।

ह्यूबर्ट लतिका को प्रेम पत्र लिखता है, लेकिन लतिका ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया है। ह्यूबर्ट ने यह बात डॉक्टर को बताई है डॉक्टर ने लतिका से भी इस बारे में बात करने की कोशिश की है लेकिन लतिका ने कोई सीधा उत्तर नहीं दिया है। अधूरा प्रेम और मृत्यु यह ह्यूबर्ट की स्थिति है। इन दोनों पात्रों के बीच में जो एक संभावनाशील अस्तित्व कहानी में है जिसके पास अभी समय है जो अपने जीवन को अपने अनुभव से तालमेल बिठाकर के थोड़ा सा बदलने की क्षमता भी अपने भीतर उपजा सकती है वह लतिका है इसलिए कहानी में जो गति है वह लतिका के जीवन की गति है।

परिंदे अंतिम परिणति में इस तरह से आत्मान्वेषण की कहानी बन जाती है। जहां अवसाद के जितने गहरे अंधेरे हैं उतनी ही प्रकाश की ओर बढ़ चलने की व्यग्रता भी है। “लीड काइंडली लाइट” गीत की पंक्ति लड़कियां गाती है।

फादर एलमण्ड गिरजाघर में सरमन देते हैं – ही दैट फाॅलोथ मी शैल नॉट वॉक इन डार्कनेस बट शैल हैव द लाइट ऑफ़ लाइफ यानी जो मेरे पीछे-पीछे आएगा वह अंधेरे में नहीं चलेगा बल्कि उसे जीवन का प्रकाश मिलेगा ।

लतिका के पास कैप्टन गिरीश नेगी के साथ एक सुंदर भविष्य बनाने का अतृप्त रह गये कामनाओं से उत्पन्न हुआ अवसाद है, यह उसके जीवन की नियति है। वह इस प्रकार से जीवन के बहाव की ओर से पीठ की वे चल रही है। वह अपने इस है हठधर्मिता में छपी मूर्खता को जानती है और पहचानती भी है कि गिरीश की अनुपस्थिति में उसकी स्मृति को छाती से चिपकाए रहने जैसा बंदरिया जैसा मोह उसे कहीं नहीं ले जाएगा।

उसे अपने बचपन की दिल्ली की घटना याद आती है जिसमें कुतुबमीनार की चोटी पर चढ़कर उसे नीचे के लोगों को देखने कर उसे लगा जैसे छोटे-छोटे खिलौने चल रहे हैं उतनी ही दूर है जिंदगी उससे। ऐसे ही छोटे-छोटे बिंबों से निर्मल वर्मा अपने कथ्य को अभिव्यक्त करने की कोशिश करते हैं जबकि सच यह है कि जिंदगी धूप की तरह तल्ख, तपती रेत की-सी कठोर और संघर्षमयी होती है। भावुकता की सीलन भरी कोठरी में यदि बंद रखा जाए तो विवेक पर फंफूद लग जाती है।

यह जानने-समझने की बावजूद बार-बार जतन से संजोयी गई तार्किकता बार-बार गायब हो जाती है। पता नहीं वह कौन सी चीज है जो हमें चलाएं चलती है, हम रुकते हैं तो भी वह अपने रेले में घसीट ले जाती है। क्या है वह चीज? वह जिंदगी की अपनी ताकत है। अंतत जीवन की शक्ति अपने आप को आरूढ़ करती है और व्यक्ति को उसके अवसाद के गड्ढे से बाहर निकल लाती है।

लेखक ने शब्द की अभेद्य दीवार को लांघकर शब्द के पहले मौन जगत में प्रवेश करने का प्रयत्न किया है और वहां जाकर प्रत्यक्ष इंद्रियबोध के द्वारा वस्तुओं के मूल स्वरूप को पकड़ने का साहस दिखलाया है, इसलिए उनकी कहानी में नवीनता है। भाषा में नवजातक की-सी सहजता और ताजगी है। वस्तुओं के चित्र में पहले पहल देखे जाने का परिचित अपरिचित टटकापन है। परिंदे कहानी वर्तमान की गहराईयों के बीच घुमड़ती किंकर्तव्यविमूढ़ता को बाहरी वातावरण की निर्जनता, सीलन और लैंप के उजाले में छिड़क कर और विकेंद्रीकृत होते अंधियारे के जरिए व्यक्ति करती है।

यह कहानी इन्हीं अनसुलझे सवालों का उत्तर ढूंढने की एक सूक्ष्म और गहन यात्रा है। इस प्रकार, ‘परिंदे’ सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन की गूढ़ पहेलियों और मानवीय मन की जटिलताओं का एक दार्शनिक अन्वेषण है, जो पाठकों को आत्मचिंतन और अस्तित्ववादी प्रश्नों के गहरे सागर में डुबो देता है। निर्मल वर्मा अपनी विशिष्ट शैली और भावुकता से सराबोर बिम्बों के माध्यम से इस यात्रा को अविस्मरणीय बना देते हैं, जहाँ हर शब्द और हर मौन एक नई परत खोलता है।

निर्मल वर्मा की ताकत है उनकी गहन सूक्ष्म अंतर्दृष्टि संगीत,बिम्ब, विचार, संवेदना अपनी तरलता ऐन्द्रियता औचित्य और माधुर्य के साथ जब परस्पर घुलते मिलते हैं तो लगभग उन ऊंचाइयों तक पहुंच जाते हैं,जहां गूढ़ दर्शनिकता को स्पर्श करने लगते हैं। उनकी भाषा का माधुर्य सिर्फ लय और माधुर्य की सृष्टि नहीं करता बल्कि चुप्पियों में कुछ ही हलचलो की बिम्बात्मक प्रस्तुति भी करता है उदाहरण के लिए ह्यूबर्ट का पियानो वादन का प्रसंग। लेखक का अपनी भाषा पर अपने शिल्प पर कड़ा अनुशासन है।

परिंदे, मुक्ति की उमंग भरी सामूहिक रचनात्मक उड़ान के प्रतीक के रूप में कहानी को अर्थव्यंजक बना जाते हैं बार-बार पूछे जाते उस सवाल को हम कहां जा रहे हैं? हमारा गंतव्य कहां है? हमारी यात्रा का उद्देश्य क्या है?

~देवांस, परास्नातक हिन्दी विभाग (दिल्ली विश्वविद्यालय)

समीक्षा- धरती धन न अपना~ जगदीश चन्द्र…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%a8-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a6/

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