समीक्षा, ‘सवा सेर गेंहू’ मुंशी प्रेमचन्द

सवा सेर गेंहू

जब से साहित्य में गद्य लिखने का प्रचलन प्रारंभ होने लगा तो साहित्य की विभिन्न विधाएं अपने अस्तित्व में आने लगी। उनमें से एक थी “ कहानी ” विधा। इसी आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को “गद्य काल ” के नाम से संबोधित किया। अर्थात अब साहित्य की रचनाएं पद में न हो करके गद्य में होने लगी जिसमें मुख्यतः उपन्यास, कहानी , निबंध , नाटक, आलोचना आदि थे।

हिंदी में कहानी सम्राट जब भी कहा जाता है। तब हर साहित्य प्रेमियों को मुंशी प्रेमचंद याद आते रहेंगे। मुंशी जी का मूल नाम धनपत राय था। जिनका जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में मुंशी अजायबराय और आनंदी देवी के यहां हुआ। मात्र सात वर्ष की अवस्था में हीं उनकी माता जी का निधन हो गया तथा 14 वर्ष की उम्र में पिता की भी आकस्मिक मृत्यु हो गई। जब वे अपने 15 वर्ष की अवस्था में आए तब उनका बाल विवाह हुआ जो की असफल रहा, तथा उनकी पहली पत्नी का निधन हो गया।

1906 में उन्होंने एक विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह किया तथा उनके दो पुत्र श्रीपत राय और अमृत राय तथा उनकी एक पुत्री कमला देवी हुए। पढ़ने का शौक उन्हें बचपन से ही था 1910 में इंटर तथा 1919 में बी.ए . करने के बाद शिक्षा विभाग में सेवाएं दी।

प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे जिन्होंने लगभग 300 कहानी और लगभग 12 प्रसिद्ध उपन्यास लिखें। उपन्यासों में सबसे प्रसिद्ध उपन्यास “ गोदान ”को कहा जाता है। उनकी पहली कहानी संग्रह “सोजे वतन” जो 1908 में प्रकाशित हुई थी। जिसे औपनिवेशिक सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था और बाद में उसे नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद प्रेमचंद उर्दू से धीरे-धीरे हिंदी में लिखना प्रारंभ कर रहे किए तथा 1910 में “ ज़माना ” नामक उर्दू पत्रिका में “ बड़े घर की बेटी ” के प्रकाशन के साथ हिंदी साहित्य जगत में मिल का पत्थर साबित हुऐ।

प्रेमचंद द्वारा लिखित कई कहानी घटना प्रधान होकर चरित्र को सार्थकता प्रदान करते हैं। जिससे चरित्र के पीछे छिपे उपदेश को सत्य की भूमि मिल जाती है और वह निरंतर विकसित होते रहता है। तात्कालिक समय में जहां कहानियां मनोरंजन तथा उपदेश परख होते थे प्रेमचंद के यहां ज्यादा नहीं। ” प्रेमचंद की कहानी केवल मनोरंजन के उद्देश्य से नहीं लिखी गई। उन सभी में कोई ना कोई सुझाव ,जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण, किसी समस्या का हल जरूर मिलता है।
यह बात आलोचक डॉ रामविलास शर्मा ने अपनी किताब “ प्रेमचंद और उनका युग ” में लिखा है।

वैसे ही उनकी एक प्रसिद्ध कहानी “ सवा सेर गेहूं ” है जो सन् 1924 के “ चांद “पत्रिका में प्रकाशित हुई। यह कहानी जिस समय लिखी गई वह दौर भारतीय इतिहास के “ वैकोम सत्याग्रह ” 1924 सक्रिय था , जिसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव और वैसे समाज जिसे दलित माना जाता है। उन्हें मंदिरों में प्रवेश की अनुमति और उनके उत्पीड़न को खत्म करता है।

‘सवा सेर गेंहू’ कहानी की मूल संवेदना-

“सवा सेर गेहूं” कहानी में भी एक ऐसी जाति विशेष की  चरित्र मुंशी जी ने खींचा है। जो उस समूचे व्यवस्था और उत्पीड़न को सार्थक करता है। “ किसी गांव में शंकर नामक एक कुर्मी किसान रहता था ” कहानी की पंक्तियों में दो शब्द किसान और कुर्मी मिलते हैं , दोनों ही उस व्यवस्था के शिकार थे। किसान को औपनिवेशिक सरकार ने और कुर्मी को समाज ने चारों तरफ से लूट लिया है।

‘ शंकर ‘ जो एक मामूली सा किसान था। जो मुख्य धारा में नहीं था परंतु उसकी हालत मुख्य धारा में भी नहीं थी। सदा गरीब तथा जो किसी दिन भोजन पता और किसी दिन पानी से पेट भरकर सो जाता, समाज की षड्यंत्र ( छल , प्रपंच) उससे कोसों दूर थे। समाज की व्यावहारिकता उसमें भी था जो किसी अतिथि के आगमन पे उनका सत्कार करना और नाना प्रकार के भोजन, दान आदि भेट करना l यदि उसमें भी अतिथि कोई सिद्ध पुरुष हुए तो …. !

भारतीय समाज में ‘साधु महात्मा’ ईश्वर का ही रूप माना जाता है। उनके स्वागत में कोई कमी नहीं रखी जाती l शंकर के द्वार पर भी एक साधु महात्मा पधारे और उसके यहां डेरा जमा बैठे थे। उनके खातिरदारी में वह क्या उपस्थित करता? उसके पास स्वयं के लिए भोजन नहीं था। साधु के लिए पकवान कहां से लाता है? शंकर के घर आटा नहीं था न ही गेहूं। भला वह इंसान गेहूं आटा कहां से लाता? पूरे गांव में इंसान ही रहते थे देवता नहीं।

अर्थात पुरा गांव जौ का आटा खाता था l शंकर ने विप्र महाराज ( महाजन) से सवा सेर गेंहू उधार लिया l उसने यह समझा कि साल में दो बार महाजन खलियानी लिया करते थे उसी में डेढ़ पंसेरी देकर स्वयं को ऋण मुक्त कर लेगा। और यहीं से कहानी अपनी करवट बदलता है। महाजन शंकर से अपना उधार दिया सवा सेर गेहूं नहीं मांगता है, और शंकर यह समझता है कि वह सब खत्म है पर वास्तविक में यह महाजन का जाल था।

जिसमें शंकर फस रहा था। एक अन्य दृष्टि से देखा जाए तो तात्कालिक अंग्रेजी व्यवस्था भी इसी प्रकार की थी। जिसमें प्रेमचंद को यह सच्चाई दिखाना पड़ा। आगे शंकर और उसका भाई मंगल दोनों आपसी और असहमति और मतभेद के कारण अलग-अलग जीवन यापन करने लगते हैं। वास्तविक में समाज का यह एक करवा सच है। जिससे कभी ना कभी सभी को भोगना पड़ता है। कभी भाई के रूप में कभी पड़ोसी में। इन पंक्तियों से इस पूरे दृश्य को समझा जा सकता है।

‘एक रोएगा दूसरा हंसेगा, एक के घर मातम होगा तो दूसरे के घर गुलगुला पकेंगे, प्रेम का बंधन, खून का बंधन, दूध का बंधन आज टूट जाता है ’ और इन्हीं परिस्थितियों को समाज का कड़वा सच या समाज का दूसरा रूप भी कहा जाता है। अब शंकर कायस्थ जाति से मजदूर जाति में हस्तांतरित हो गया। कई दिनों तक घर में चूल्हा ना जलने से उसके खेत आधे हो गए बैल एक रह गया अर्थात कुछ जमीन बिक गई या उसका बंटवारा हो गया। 7 वर्ष बीत गए। शंकर जब मजदूरी कर लौट रहा था।

तब महाजन ने उसे रोक कर बोला ‘शंकर कल आकर के अपना हिसाब कर लेना, तेरे यहां साढ़े पांच मन गेहूं कब के बाकी पड़े हुए हैं और तू देने का नाम नहीं लेता हजम करने का मन है क्या? यह सुनते ही शंकर अचंभित हो गया। शंकर ने महाजन को जवाब दिया मैंने आपसे कभी कोई उधार नहीं लिया कई बार खलियानी दी दक्षिणा दी अब तक मेरा खाता शून्य होना चाहिए। पर वास्तव में यह महाजन के चतुराई थी और शंकर उसका शिकार। केवल शंकर ही क्यों? शंकर जैसे और कई गरीब किसान भी ऐसी ही व्यवस्था के चपेट में आ जाते हैं।

इस कहानी में पात्र अपने-अपने किरदार को समाज के अनुरूप जीवंत कर रहे हैं। यही प्रेमचंद की लिखावट की सबसे बड़ी खूबी है।
इस विषय को ऐसे समझे ‘ प्रेमचंद की कहानी पढ़ते समय घटना कुतूहल कम रहता है चरित्र– चित्रण की बारीकियों में पाठक जमा रहता है ’ ( डॉ. रामविलास शर्मा)। महाजन की चतुराई को यहां से समझा जा सकता है ‘ तुमने जो कुछ दिया होगा उसका कोई हिसाब नहीं चाहे एक की जगह चार पसेरी दे दो ’।

यहां लिखा पढ़ी नहीं होने से शंकर महाजन के जाल में पस्त हो गया। शंकर ने अपना हिसाब करवाया तो महाजन ने दस्तावेज दिखाए और अनाज का मूल ₹60 आंका और यदि साल के अंत तक नहीं अदा किया तो ढाई रुपए ऊपर से देनी होगी। अब शंकर कहां से पैसे लता कौन उसे पैसे देता इसकी खेती भी नहीं थी। क्या अनाज बेच करके वह पैसा देता? अब शंकर या शंकर जैसे किसान क्या करते ?

शंकर ने साल भर मजदूरी की स्वयं भूखा रहा पानी पीकर के अपने आप को संतोष रखा अपने परिवार को भी भूखा रखा , जैसे तैसे तप कर उसने साल के अंत तक ₹60 जमा कर लिए और महाजन के पास पहुंचा और महाजन को दिए। महाजन से उसने यह निवेदन किया की बचे हुए ₹15 वह जल्द ही आपको लौटा देगा परंतु महाजन ने यह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिय और जल्द पैसे देने का दबाव डालने लगा।

यहां से यह समझना आवश्यक है कि भारतीय समाज में या तात्कालिक समाज में महाजन जैसे लोगों का वर्चस्व अधिक रहा।जिसकी निंदा हर कोई करना चाहता है परंतु उसके सामने नहीं क्योंकि कभी ना कभी उसे महाजन के सामने सहायता के लिए खड़ा होना पड़ता है। शंकर का गांव भी उसी में से एक था। अब शंकर क्या करें? कहां से लाए इतने पैसे? शंकर ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया या स्वीकार कर लिया कि वह इस कर्ज को एक साल या पुनर्जन्म तक अदा नहीं कर पाएगा।

महाजन ने धीरे-धीरे बचे हुए पैसों को बढ़ाना शुरू कर दिया पहले 60 और 60 से अब 120 तक पहुंचे। धीरे-धीरे शंकर महाजन के जाल में पूरी तरह से फंस चुका था। शंकर ने महाजन के यहां मजदूरी शुरू की और अपने कर्ज की भरपाई के लिए उनके खेतों में काम करने लगा तब भी कर्ज की भरपाई नहीं हुई। ‘वह सोचता है वह गेहूं के दाने किसी देवता के श्राप की भांति आजीवन उसके सिर से न उतरा’।

एक समय के बाद शंकर ईश्वर के दरबार में चला जाता है। यहां भी महाजन ने उस गरीब को ईश्वर के दरबार में कष्ट देना उचित न समझा इतने इतने निर्दय नहीं थे। महाजन ने शंकर के बेटे को अपने यहां बंधुआ मजदूरी पर रख लिया। अब शायद ही उसका उधार कभी पूरा होता।

यहां कहानी समाप्त हो जाती है। यह कहानी तो समाप्त हो जाती है पर शंकर जैसे कितने किसान मजदूर और उनके परिवार आज भी एक ऐसे महाजन के यहां मजदूरी और संघर्ष कर रहे हैं। इसका आकलन कर पाना भी असंभव सा लगता है।

यहां प्रेमचंद ने पात्रों को और परिस्थितियों को ऐसे उपस्थित किया है। जहां एक दूसरे के बिना अन्य गौण समझा जाए। अंततः शंकर जैसे किसान और समाज के उस समूह का उत्थान नहीं हो पता जिससे वह मुख्य धारा से जुड़ सके l

~साहिल सिन्हा
   हिंदी ऑनर्स
   ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज

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