‘कोहबर की शर्त ‘ उपन्यास सन् 1965 में प्रकाशित हुआ था जिसके लेखक हैं – केशव प्रसाद मिश्र। कोहबर की शर्त उपन्यास की कथा-भूमि इस वाक्य से पूर्ण रूप से बोधगम्य है – “दोआब में बसे हुए ये दो गांव – बलिहार और चौबेछपरा ही इस उपन्यास की कथा भूमि है।”
इस उपन्यास का आरंभ काका नामक पात्र से होता है और अंत चंदन से। यह कथा मूलतः चंदन और गुंजा नामक मुख्य पात्रों के जीवन के मनभावन पल, संघर्ष और त्रासदी पर आधारित है। उपन्यास के गौण पात्रों की भूमिका और जीवन को भी भली-भाती चित्रित किया गया है, चाहे वे काका हो या ओंकार, रूपा हो या बेला।
‘कोहबर की शर्त ‘ के मूल तत्व-
ये कहानी केवल प्रेम तक ही सीमित नहीं रहती है बल्कि इसमें समाज में लिप्त निराशा, एकाकीपन और असंगति को भी लेखक ने भली-भाति निरूपित किया है। साथ ही, बलिहार और चौबेछपरा की कहानी होने के कारण इसमें उत्तर प्रदेश की परंपराओं और मान्यताओं को चित्रित किया है जो इस उपन्यास के नाम से ही दृष्ट है। ये कथा पुरानी लोक मान्यताओं को दर्शाते हुए अपने आप में आधुनिकता को अपनाती भी है जिसका जीता जागता उदाहरण है – बलिहार की होली। उपन्यास में देहाती भाषा का अत्यधिक प्रयोग किया गया है जैसे – ढेकुल, छवरि, निकसार, चुमावन।
इस कहानी के प्रेम परिदृश्य में गुंजा और चंदन की कहानी आती है। गुंजा जो कि चौबेछपरा में वैद्यजी की बेटी है और चंदन बलिहार में ओंकार का भाई है। चन्दन और गुंजा का प्रथम साक्षात्कार तब होता है जब काका बीमार पड़ते है और चंदन वैद्यजी को लेने चौबेछपरा जाता है। वैद्यजी काका के सामने ओंकार के लिए अपनी बेटी रूपा के रिश्ते का सुझाव रखते है जिसे काका मान जाते है। रूपा और ओंकार की शादी में कोहबर की पूजा में चंदन को गुंजा की एक शर्त माननी होती है जिस कारण इस उपन्यास का नाम कोहबर की शर्त पड़ा।
शुरुआत में मनभावन वाला ये उपन्यास आधा होने पर एक त्रासदी का रूप धारण कर लेता है। चंदन के आंखों के सामने उसकी सारी दुनिया पलट जाती है। उसकी आंखों के सामने उसके काका और भौजी की मृत्यु हो जाती है। पत्नी की मृत्यु के कारण ओंकार अवसादग्रस्त हो जाता है और चंदन पर जिम्मेदारियों का एक बोझ पड़ जाता है। उसके पैरों तले जमीन जब खिसक जाती है जब वैद्यजी गुंजा का ब्याह ओंकार से तय कर देते है। इतने दिनों तक उनके सामने रहे चन्दन की मन की बात को ओंकार द्वारा ना समझे जाने पर चंदन अवसाद में पहुंच जाता है।
मन की विपरीत स्थिति होने पर इंसान का बौरा जाना आम बात है जो कि चंदन और चंदर दोनों के साथ हुआ। जिस प्रकार गुनाहों का देवता में चंदर जी – जान लगा देता है सुधा की शादी में उसी प्रकार चंदन भी गुंजा की शादी में अपनी जान झकझोर देता है। एक तरफ चंदन जो अवसाद में था, वहीं दूसरी तरफ गुंजा जो कि इस बात से अपरिचित थी कि उसका ब्याह ओंकार से हो रहा है , मन ही मन में दीपासत्ती पर माथा टेक रही थी।
चंदन ने अपने जीवन में गुंजा के चार रूपों को देखा था –
कुंवारी गुंजा, दुल्हन गुंजा, विधवा गुंजा, मृत गुंजा; परन्तु वह कभी भी गुंजा को अपनी पत्नी के रूप में नहीं देख पाता है यह उसके दुख का सबसे बड़ा कारण था। गुंजा को चौबेछपरा छोड़ने जाते समय गुंजा अपने पैर के आलते को चंदन के पैर पर लगा देती है परंतु अंत में ना वह आलता बचता है और ना ही गुंजा।चंदन का जीवन दुख से भर चुका था।
उसने अपने अभिभावक समान काका, पिता समान भाई , मां समान भौजी को खो दिया था। अब उसके पास केवल गुंजा बची थी जो उसके सामने होने के बावजूद भी उसकी नहीं थी। कहानी में गुंजा के विपरीत एक पात्र को भी दिखाया गया है जिसका नाम है – बेला। बेला, सामाजिक बंधनों को तोड़ फेंकने वाला ये पात्र अंत में जाकर स्वयं अवसाद में लीन हो जाती है।
एक बहुत प्रचलित कहावत कहावत है – “दुख केवल उनका नहीं होता है जो चले जाते है बल्कि उनका होता है जो पीछे छूट जाते है।” इस कथा में भी ये लागू होता है। चंदन अपने जीवन के सभी लोगों को खो देता है, उपन्यास के अंत में जाकर वह गुंजा से भी सदैव के लिए भिन्न हो जाता है।
इस कहानी के नाम पर अलग – अलग लोगों के अलग – अलग तर्क है। कोई कहता है कि गुंजा चंदन से यह शर्त रखती है उसकी शादी ओंकार से होने दो, उन्हें हमारे में कुछ मत बताओ। जबकि कुछ कहते है कि गुंजा चंदन से ब्याह करने की शर्त रखती है जो कि पूरी नहीं हो पाती है।
इस उपन्यास पर हिंदी सिनेमा जगत की दो प्रमुख फिल्में भी बनी है – ‘नदिया के पार’ और ‘हम आपके हैं कौन?’ परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये दोनों फिल्म मिल कर भी उपन्यास के साथ न्याय नहीं कर पाती है। इसका मुख्य कारण हो सकता है – “हैप्पी एंडिंग” से लगाव। परन्तु सुखांत के चक्कर में हम उन्पन्यासों के साथ कब अन्याय कर देते है हमें पता ही नहीं चल पाता।
~दिशा, बीए.आनर्स (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय
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