उसने कहा था~ चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

उसने कहा था – तात्विक समीक्षा

प्रस्तावना :
हिंदी कहानी का आरंभिक स्वरूप नीति-कथा, लोककथा और उपदेशात्मक आख्यानों से निर्मित था। बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक आते-आते हिंदी कथा साहित्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ उसे आधुनिक मनुष्य की आंतरिक जटिलताओं, नैतिक द्वंद्वों और स्मृति-बोध को अभिव्यक्त करने वाली विधा बनना था। इसी संक्रमणकाल में चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी की कहानी “उसने कहा था” प्रकाशित होती है, जो न केवल हिंदी की पहली आधुनिक कहानियों में गिनी जाती है, बल्कि आगे आने वाली संपूर्ण कथा-परंपरा की वैचारिक दिशा भी निर्धारित करती है।

हिंदी कहानी के विकासक्रम में “उसने कहा था” का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि वैचारिक है। यह कहानी प्रेमकथा होते हुए भी रोमानी नहीं है, युद्धकथा होते हुए भी वीर-रसात्मक नहीं है, और देशभक्ति की कथा होते हुए भी नारेबाज़ी से सर्वथा मुक्त है। यह कहानी प्रेम, युद्ध और त्याग की कथा होते हुए भी वस्तुतः स्मृति, वचन और नैतिक उत्तरदायित्व का आख्यान है।

इसका महत्त्व इस बात में निहित है कि यह व्यक्ति के नैतिक निर्णय को साहित्य का केंद्र बनाती है। गुलेरी जी का योगदान हिंदी कहानी को घटना से विचार और भावुकता से नैतिकता की ओर ले जाने में निर्णायक माना जाता है। “उसने कहा था” ने यह सिद्ध किया कि कहानी केवल मनोरंजन या संदेश नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की सूक्ष्म जाँच-पड़ताल का माध्यम भी हो सकती है।

1. कथानक :

(क) कथा-संक्षेप
कहानी का कथानक मूलतः तीन भागों में बंटा हुआ है। कहानी के आरंभ में अमृतसर की गलियों में एक सिक्ख बालक एवं बालिका का परिचय तथा उनके मध्य उत्पन्न सहज बाल्य-स्नेह के अंकुर का प्रस्फुटन अंकित है। कथानक के दूसरे भाग में अमृतसर की गलियों का वह सिक्ख बालक अब जमादार लहनासिंह बन, युद्ध में जाने से पूर्व अपने सूबेदार के घर जाता है।

वहाँ सूबेदारनी के रूप में उसकी भेंट उसी बचपन में मिली सिक्ख बालिका से होती है जो उसे बाल्यावस्था के एक घटना का स्मरण कराते हुए अपने पति एवं पुत्र के प्राणों की रक्षा का वचन मांगती है। कहानी के अगले भाग में कथा फ्रांस और बेल्जियम के युद्ध क्षेत्र में पहुँच जाता है, जहाँ लहनासिंह अपनी चतुरता से जर्मन लेफ्टिनेंट को समाप्त कर सिक्ख रेजिमेंट को बचा लेता है।

लहनासिंह अपने प्राण देकर सूबेदारनी के पुत्र बोधा सिंह और पति हज़ारा सिंह को बचाता है और सूबेदारनी को दिये वचन को निभाता है। कहानी का चरम-उत्कर्ष तब आता है जब युद्ध भूमि में घायल लहनासिंह, जीवन के अंतिम क्षणों में, अपने अतीत की स्मृतियों के चित्र देखता है। लहनासिंह के मृत्यु के साथ ही कहानी समाप्त हो जाती है।

कथानक का मध्य भाग (सूबेदारनी-प्रसंग) कहानी में अंतिम में आता है, जब लहनासिंह मृत्यु शैय्या पर होता है। कथासूत्र को इस क्रम में रखने से कहानी में कलात्मकता तो आई ही है, साथ ही उसमे कौतूहलता बढ़ गई है।

(ख) कथानक की संरचना
“उसने कहा था” का कथानक पारंपरिक अर्थों में न तो सीधा है, न ही घटना-प्रधान। इसकी संरचना स्मृति के आवर्तन पर आधारित है। वर्तमान का एक क्षण अतीत की पूरी दुनिया को सक्रिय कर देता है और अतीत पुनः वर्तमान के निर्णय को आकार देता है। इस कहानी का कथानक रैखिक नहीं, बल्कि आवर्तीय है। अतीत → वर्तमान → अतीत → वर्तमान की यह गति कहानी को केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं रहने देती, बल्कि उसे स्मृति-संचालित नैतिक आख्यान बना देती है।

यहाँ कथानक का उत्कर्ष किसी युद्ध-विजय में नहीं, बल्कि आत्म-बलिदान के मौन निर्णय में निहित है। कहानी का अंत भी किसी नाटकीय समापन की ओर नहीं जाता, बल्कि पाठक को एक गहरे नैतिक प्रश्न के साथ छोड़ देता है।

(ग) कथानक की तात्त्विक भूमिका
कथानक का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह पाठक को भावनात्मक उत्तेजना में नहीं, बल्कि आंतरिक विवेक में ले जाता है। युद्ध, प्रेम और त्याग — तीनों यहाँ साध्य नहीं, बल्कि नैतिक मूल्य की परीक्षा के साधन हैं। इस प्रकार कथानक कहानी के उद्देश्य का वाहक बनता है, न कि केवल उसकी बाह्य संरचना।

2. पात्र एवं पात्र-चित्रण :
“उसने कहा था” की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पात्र संख्या में सीमित होते हुए भी अर्थ में अत्यंत व्यापक हैं। यहाँ कोई भी पात्र केवल कथा-आगे-बढ़ाने का उपकरण नहीं है, बल्कि प्रत्येक चरित्र कहानी के नैतिक ढाँचे में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है। कहानी में पुरुष पात्रों के रूप में लहनासिंह, सूबेदार हज़ारा सिंह, बोधा सिंह, वजीरा सिंह एवं स्त्री पात्र के रूप में सूबेदारनी है। कहानी में नायक के रूप में लहनासिंह को स्वीकर किया जा सकता है। इस कहानी का नायक किसी महाकाव्यीय आदर्श का प्रतिनिधि नहीं है। वह न तो वीरता का घोष करता है, न प्रेम का प्रदर्शन। उसका व्यक्तित्व संयम, मौन और आंतरिक अनुशासन से निर्मित है।

(क) लहना सिंह :
लहना सिंह इस कहानी का केंद्रीय पात्र है और हिंदी कहानी के इतिहास में वह एक ऐसे नायक के रूप में प्रतिष्ठित होता है जो कि न भाषण देता है; न अपने त्याग का प्रदर्शन करता है; न ही किसी आदर्शवादी मुद्रा में खड़ा दिखाई देता है। उसका व्यक्तित्व आचरण से निर्मित है, कथन से नहीं।
•बाल्यावस्था का लहना सिंह –
कहानी के आरंभिक अंशों में लहना सिंह एक चंचल, हँसमुख, शरारती बालक के रूप में सामने आता है। उसका व्यवहार सहज है, लोकजीवन से जुड़ा हुआ है। यही बाल्य रूप आगे चलकर उसके व्यक्तित्व की मानवीय जड़ें तैयार करता है।

•आदर्श प्रेमी के रूप में –
लहना सिंह के आदर्श प्रेमी रूप का संकेत बाल्यावस्था में सिख बालिका को टाँगे के नीचे आने से बचाने पर ही मिलता है। पर इस प्रेम का उत्कर्ष तब होता है जब लहना सिंह अपने प्राण देकर भी सूबेदारनी के पति एवं पुत्र के प्राण बचाता है; गहरे घाव लगने पर भी स्वयं एम्बुलेंस में न जाकर सूबेदारनी के पति एवं पुत्र को अस्पताल भेज अपने वचन को निभाता है। वह प्रेम करता है, पर उस प्रेम को अधिकार नहीं बनाता। वह वचन निभाता है, पर उसका प्रचार नहीं करता। यही गुण उसे विशिष्ट बनाता है।

* युद्धभूमि में लहना सिंह –
युद्धकालीन लहना सिंह पूर्णतः बदला हुआ नहीं, बल्कि परिपक्व हुआ हुआ वही बालक है। उसके भीतर प्रेम है, पर वह अधिकार में नहीं बदलता। उसके भीतर साहस है, पर वह प्रदर्शन में नहीं बदलता। उसका आत्मबलिदान किसी वीर-घोषणा का परिणाम नहीं, बल्कि एक निजी नैतिक निर्णय का निष्कर्ष है। युद्ध भूमि में लहना सिंह एक सैनिक के रूप में अपने कौशल तथा चातुर्य का परिचय देते हुए सिक्ख रेजिमेंट को जर्मन सेना के आक्रमण से बचाता है।
इस प्रकार लहना सिंह हिंदी कहानी का वह नायक है जो बाह्य वीरता नहीं, बल्कि अंतरात्मा की निष्ठा का प्रतिनिधित्व करता है।

(ख) सूबेदारनी / सिक्ख बालिका
सूबेदारनी का पात्र कथा में सीमित समय के लिए उपस्थित होता है, किंतु उसका प्रभाव संपूर्ण कहानी में व्याप्त रहता है। वह पारंपरिक अर्थों में नायिका नहीं है— न उसके सौंदर्य का विस्तार से वर्णन है और न प्रेम की कोई प्रत्यक्ष घोषणा; फिर भी वही कहानी की नैतिक प्रेरक शक्ति है। उसका कथन किसी प्रेम-स्वीकार का वाक्य नहीं, बल्कि विश्वास और अपेक्षा का सूक्ष्म संकेत है। वह लहना सिंह से कुछ माँगती नहीं, केवल एक भाव व्यक्त करती है—और वही भाव आगे चलकर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। उसका चरित्र भौतिक उपस्थिति में सीमित होते हुए भी कहानी के नैतिक ढाँचे में केंद्रीय है।

वह देह से अधिक स्मृति और नैतिक आग्रह के रूप में उपस्थित रहती है। यह पात्र-रचना कहानी को भावुक प्रेमकथा बनने से बचाती है।यह चरित्र स्त्री को भावुक प्रेमिका नहीं, बल्कि नैतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जो उस समय की हिंदी कथा-परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है।

(ग) सूबेदार और अन्य सैनिक : गौण पात्रों की कार्यात्मक भूमिका
कहानी के गौण पात्र—सूबेदार हज़ारा सिंह , बोधा सिंह , अन्य सिपाही—संख्या में कम और संवाद में सीमित हैं, किंतु वे कहानी के यथार्थ-बोध को सुदृढ़ करते हैं। सूबेदार अनुशासन और सैन्य व्यवस्था का प्रतिनिधि है, जबकि अन्य सैनिक युद्ध की कठोर वास्तविकता को सामने लाते हैं। ये पात्र कहानी के केंद्रीय नैतिक संघर्ष को और अधिक तीव्र बना देते हैं।

3. कथोपकथन :
“उसने कहा था” में संवाद अत्यंत सीमित हैं, किंतु उनकी अर्थ-गहनता असाधारण है। यह कहानी संवादों के विस्तार से नहीं, बल्कि संवादों के भार से प्रभाव उत्पन्न करती है। यहाँ संवाद कथा को आगे बढ़ाने से अधिक उसके नैतिक तनाव को सघन करने का कार्य करते हैं। शीर्षक स्वयं एक ऐसा संवाद है जो पूरी कहानी को अर्थ प्रदान करता है। यह वाक्य किसी भावनात्मक विस्फोट की तरह नहीं आता, बल्कि धीरे-धीरे पाठक की चेतना में स्थिर होता है।

(क) शीर्षक-संवाद : “उसने कहा था”
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरी कहानी का नैतिक सूत्र है। यह संवाद किसी विशिष्ट क्षण में नहीं, बल्कि कहानी के हर चरण में अर्थ बदलता हुआ उपस्थित रहता है। इस संवाद की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यह कभी प्रत्यक्ष रूप से दोहराया नहीं जाता, फिर भी पूरी कहानी उसी के चारों ओर घूमती है।

(ख) अल्पसंख्यक संवादों की भूमिका :
कहानी में उपस्थित अन्य संवाद भी अत्यंत संयमित हैं। वे नाटकीयता नहीं रचते, बल्कि परिस्थिति को यथार्थ के धरातल पर बनाए रखते हैं। संवादों की यह संक्षिप्तता पाठक को स्वयं अर्थ ग्रहण करने के लिए विवश करती है। यह संवाद-शैली कहानी को भावुकता से बचाकर बौद्धिक-संवेदनात्मक ऊँचाई प्रदान करती है। युद्ध भूमि के चित्रण को भी उपयुक्त संवादों के माध्यम से जीवंत बनाया गया है।

(ग) मौन का संवाद
संवादों में मौन का प्रयोग विशेष उल्लेखनीय है। यह मौन पाठक को सक्रिय पाठक बनाता है और कहानी को एकतरफा भावप्रदर्शन से मुक्त करता है। इस कहानी में जो सबसे प्रभावशाली है, वह ‘कहा गया’ नहीं, बल्कि ‘न कहा गया’ है। लहना सिंह का त्याग मौन है, उसकी पीड़ा मौन है, उसका प्रेम मौन है। यही मौन संवाद कहानी को साधारण कथा से उठाकर नैतिक अनुभव में बदल देता है।

4. देश–काल–वातावरण :
“उसने कहा था” में देश–काल–वातावरण केवल घटनाओं की पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि कहानी के नैतिक अर्थ को सक्रिय रूप से गढ़ने वाला तत्त्व है। गुलेरी जी ने वातावरण-निर्माण को सजावटी न बनाकर सार्थक संरचनात्मक भूमिका प्रदान की है।

(क) काल :
कहानी का प्रमुख कालखंड प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1918) का समय है, जब भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना के अंतर्गत यूरोप के युद्धक्षेत्रों में भेजे गए थे। यह समय हिंदी साहित्य में केवल ऐतिहासिक सूचना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता; उपनिवेशित भारतीय चेतना और कर्तव्य बनाम आत्मसम्मान के जटिल संबंधों का प्रतीक है। कहानी में युद्धकाल वीरता का उत्सव नहीं, बल्कि “नैतिक निर्णय की चरम परिस्थिति” के रूप में उपस्थित है। गुलेरी जी यहाँ यह दिखाते हैं कि जब जीवन का संकट चरम पर होता है, तभी मनुष्य के मूल मूल्य वास्तविक रूप में सामने आते हैं।

(ख) स्थान :
कहानी दो प्रमुख स्थानिक स्तरों पर विकसित होती है—
•भारत (पंजाब का परिवेश) – बाल्यकालीन अंशों में पंजाब का लोकजीवन, सिख संस्कृति और ग्रामीण वातावरण झलकता है। यह स्थान स्मृति और भावनात्मक जड़ों का प्रतीक है।
•यूरोप का युद्धक्षेत्र – यह स्थान कठोर, अमानवीय और मृत्यु-प्रधान है। यहाँ कोई आत्मीयता नहीं, केवल आदेश, गोलियाँ और घायल शरीर हैं।
इन दोनों स्थानों का अंतर्विरोध कहानी के केंद्रीय भाव को तीव्र करता है— प्रेम और स्मृति की कोमल दुनिया बनाम युद्ध की निष्ठुर वास्तविकता।

(ग) वातावरण :
युद्ध का वातावरण लहना सिंह के त्याग को महिमामंडित नहीं करता, बल्कि और अधिक मौन, गंभीर और नैतिक बना देता है। युद्धकालीन वातावरण और औपनिवेशिक संदर्भ कहानी का बाहरी ढाँचा हैं। लेखक का उद्देश्य न तो युद्ध का यथार्थवादी चित्रण है, न ऐतिहासिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करना। यह वातावरण दरअसल नैतिक परीक्षा की भूमि है, जहाँ प्रेम, कर्तव्य और स्मृति की वास्तविक कीमत तय होती है। युद्ध यहाँ वीरता का मंच नहीं, बल्कि मनुष्य की नैतिक दृढ़ता की कसौटी है। इस प्रकार देश-काल-वातावरण कहानी में निष्क्रिय पृष्ठभूमि न रहकर सक्रिय अर्थ-संरचना का अंग बन जाता है।

5. भाषा :
गुलेरी जी की भाषा-शैली “उसने कहा था” की आत्मा है। यह भाषा न तो अत्यधिक अलंकृत है, न ही शुष्क यथार्थवादी। गुलेरी जी की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उसका संयम है। यह भाषा भाव को उकसाती नहीं, बल्कि उसे थामे रहती है। इसी कारण कहानी करुणा जगाती है, किंतु भावुकता में नहीं गिरती।

(क) भाषा की प्रकृति –
भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और बोलचाल के निकट है। शब्द चयन सधा हुआ है। संस्कृतनिष्ठता और उर्दू प्रभाव का संतुलन दिखाई देता है। पात्रों के अनुरूप उनके संवादों में पंजाबी शब्दों का सकुशल प्रयोग है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि इस कहानी की भाषा भाव को उभारती नहीं, नियंत्रित करती है। यह भाषा पाठक को कहानी पढ़ने नहीं, बल्कि अनुभव करने के लिए प्रेरित करती है।

(ख) शैलीगत विशेषताएँ –
•संकेतात्मक शैली : बहुत-सी बातें सीधे न कहकर संकेत में कही गई हैं। यही कारण है कि कहानी बार-बार पढ़ने पर नए अर्थ देती है।
•संयमित करुणा : मृत्यु, पीड़ा और त्याग का वर्णन होते हुए भी भाषा कभी भावुकता में नहीं फिसलती।
•काव्यात्मक गद्य : गद्य में अंतर्निहित लय और भावात्मक गहनता है, किंतु वह कविता बनने का दावा नहीं करती। इसमें एक प्रकार की काव्यात्मक गद्यात्मकता है, जो कथ्य को बोझिल बनाए बिना गहन बना देती है।

(ग) मौन की भाषा –
“उसने कहा था” की सबसे बड़ी भाषिक उपलब्धि मौन का सृजन है। लहना सिंह का अंतिम निर्णय, उसकी पीड़ा, और उसका बलिदान — सब कुछ शब्दों से अधिक मौन में अभिव्यक्त होता है।यह मौन आधुनिक हिंदी कहानी की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

6. उद्देश्य :
कहानी का तात्त्विक उद्देश्य किसी एक भाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बहुस्तरीय नैतिक विमर्श प्रस्तुत करती है।

(क) प्रेम का नैतिक रूपांतरण –
यहाँ प्रेम अधिकार नहीं माँगता; प्राप्ति की अपेक्षा नहीं करता बल्कि कर्तव्य में रूपांतरित हो जाता है। गुलेरी जी प्रेम को रोमानी भावना से उठाकर नैतिक प्रतिबद्धता बनाते हैं। यह कहानी प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यहाँ प्रेम त्याग की ओर ले जाता है, पर वह त्याग आत्मप्रदर्शन नहीं बनता।

(ख) स्मृति का दार्शनिक पक्ष –
स्मृति यहाँ अतीत का बोझ नहीं, बल्कि नैतिक दिशा देने वाली शक्ति है। “उसने कहा था” — यह वाक्य स्मृति के माध्यम से वर्तमान के निर्णय को नियंत्रित करता है।

(ग) देशभक्ति का मौन स्वरूप –
कहानी में देशभक्ति न नारों में है; न घोषणाओं में; यह देशभक्ति निजी सुख के त्याग से उत्पन्न नैतिक आचरण है। यह दृष्टि आधुनिक, परिपक्व और गैर-आक्रामक है।

निष्कर्ष :
गुलेरी जी द्वारा निर्मित कालजयी कथा “उसने कहा था” की सबसे बड़ी शक्ति इसके सभी कथा-तत्त्वों की एकात्मता में निहित है। कहानी के सभी तत्त्व — कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा और उद्देश्य — एक ही मूल्यात्मक केंद्र की ओर उन्मुख हैं। यही एकात्मता “उसने कहा था” को केवल एक उत्कृष्ट कहानी नहीं, बल्कि हिंदी कथा साहित्य का नैतिक मानक बनाती है।

इसकी कथानक स्मृति-आधारित है; पात्र नैतिक चेतना के वाहक हैं; संवाद संकेतात्मक हैं; वातावरण मूल्य-परीक्षा का क्षेत्र है; भाषा संयमित और संवेदनशील है; और उद्देश्य नैतिकता की प्रतिष्ठा है। यही कारण है कि यह कहानी केवल अपने समय की नहीं, बल्कि हर समय की नैतिक कथा बन जाती है।

~ रत्नेश, परास्नातक हिन्दी विभाग ( दिल्ली विश्वविद्यालय )

समीक्षा, ‘सवा सेर गेंहू’ मुंशी प्रेमचन्द…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b9%e0%a5%82/

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