समीक्षा, जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि

समीक्षा, जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि

जिन दलित साहित्यकारों ने आत्मकथा लिखी उनमें सबसे महत्वपूर्ण तथा प्रसिद्ध ओमप्रकाश वाल्मीकि जी का “जूठन” है जो दो खंडों में प्रकाशित है। इस आत्मकथा में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने जीवन के भोगें सहे नग्न यथार्थ को और जातिवादी मानसिकता, वेदना को दिखाया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि का जूठन ‘1997’ में प्रकाशित हुआ है और यह … Read more

आपका बंटी

समीक्षा, आपका बंटी~ मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ हिन्दी साहित्य की दुर्लभ रचनाओं में से एक है। यह उपन्यास न केवल दाम्पत्य जीवन की कटु सच्चाइयों को उजागर करता है, बल्कि एक छोटे से बालक की आंतरिक उथल-पुथल को इतनी गहराई से खंगालता है कि पाठक स्वयं उसकी तड़प में सम्मिलित हो जाते हैं। 1971 में प्रकाशित यह … Read more

समीक्षा, झूठा सच- यशपाल

समीक्षा, झूठा सच- यशपाल

झूठा सच उपन्यास यशपाल द्वारा रचित है। यह उपन्यास दो खण्डों में विभक्त है। वतन और देश(1958) तथा देश का भविष्य(1960)। यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी का चित्रण करने के साथ-साथ मानवीय जीवन की त्रासदी का चित्रण भी करता है। इस उपन्यास में मुख्य पात्र तारा, जयदेव पुरी और कनक हैं। इस उपन्यास में विभाजन … Read more

‘कोहबर की शर्त ‘ उपन्यास की समीक्षा

'कोहबर की शर्त ' उपन्यास की समीक्षा

‘कोहबर की शर्त ‘ उपन्यास सन् 1965 में प्रकाशित हुआ था जिसके लेखक हैं – केशव प्रसाद मिश्र। कोहबर की शर्त उपन्यास की कथा-भूमि इस वाक्य से पूर्ण रूप से बोधगम्य है – “दोआब में बसे हुए ये दो गांव – बलिहार और चौबेछपरा ही इस उपन्यास की कथा भूमि है।” इस उपन्यास का आरंभ … Read more

हिन्दी साहित्य इतिहास की लेखन परंपरा

हिन्दी साहित्य इतिहास की लेखन परंपरा

इतिहास लेखन वर्षों से चला आ रहा है। पिछले लेख में हमने हिंदी साहित्य के इतिहास दर्शन की बात की। इस लेख में हम हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन परंपरा की बात करेंगे। कि कैसे हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा गया? इस इतिहास को लिखने में किन-किन विद्वानों का अहम योगदान था? और हिंदी साहित्य … Read more

साहित्य इतिहास का दर्शन

साहित्य इतिहास का दर्शन

अगर हमें भारत का इतिहास जानना है तो हमारी पहली कड़ी होगी कि हम भारत के समाज के रूपरेखा उसके बनावट का इतिहास को जाने। तभी हम सुसंगठित और तथ्यों के साथ भारत का स्पष्ट इतिहास लिख सकते हैं। यही बात साहित्य पर भी लागू होता है क्योंकि किसी भी साहित्य के इतिहास का निर्माण … Read more

महाजनपद

महाजनपदों का उदय लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व मे गंगा और यमुना एवं बिहार में लोहे के अत्यधिक प्रयोग के कारण अधिक उत्पादन होने लगा था। उत्तर वैदिक काल के जनपद अब महाजनपदों में बदल गए। बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में 16 महाजनपदों की जानकारी मिलती है। अंगुत्तर निकाय में … Read more

गुप्तकालीन धर्म और कला

गुप्तकालीन धर्म और कला

गुप्त शासको का अपना धर्म वैष्णव था लेकिन वह अन्य धर्म के प्रति भी उदारवादी थे। दो गुप्त शासको समुद्रगुप्त और कुमार गुप्त को अश्वमेध यज्ञ करने का श्रेय प्राप्त है।  वैष्णव धर्म– गुप्त शासको का राजकीय धर्म वैष्णव भी था। उन्होंने परमभागवत की उपाधि धारण की तथा ‘गरुड़’ को अपना राजकीय चिन्ह बनाया। गुप्तकालीन … Read more

गुप्तकालीन प्रशासन

गुप्तकालीन प्रशासन

गुप्त राजाओं का काल भारतीय इतिहास में ‘स्वर्णयुग’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस सभ्यता और संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ है। अब हम इन्ही विकास की चर्चा करेंगे। प्रशासन- गुप्त शासन का मुख्य केंद्र बिंदु राजा होता था। गुप्त शासक महाराजाधिराज और परमभट्टारक जैसी बड़ी उपाधियां धारण करते थे। राजा की … Read more

मौर्य प्रशासन और कला

मौर्य प्रशासन और कला

गुप्तचर प्रशासन- मौर्य काल में गुप्तचर प्रशासन का महत्वपूर्ण स्थान था मौर्य काल में गुप्तचरों को गूढ़पुरुष कहा जाता था। मौर्य काल में 5 प्रकार के गुप्तचरों का पता चलता है जो निम्नलिखित हैं- संस्था – विभागो से संबंधित जानकारियां जुटाते थे। कपटिक – ये विद्यार्थियों के वेश में रहते थे। उदस्थित – ये साधुओं … Read more