मीनाक्षी अम्मन मंदिर, मदुरई

मीनाक्षी अम्मन मंदिर- मदुरई वैगई नदी के किनारे बसा हुआ तमिलनाडु का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। शायद सबसे पुराना भी। कभी यह पांडय साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। 13 वी सदी तक पांडय साम्राज्य श्रीलंका तक फैला था। वह अपनी बंदरगाहों से पश्चिम, मध्य पूर्व तथा एशिया में उम्दा किस्म के मोती तथा रेशम का व्यापार करते थे। आधुनिक मदुरई अपनी सूती साड़ियों मदुरई सुनगड़ी और चमेली के फूलों के लिए जाना जाता है। लेकिन इन सबसे पहले मदुरई घर है मींन सी आंखों वाली महारानी इष्ट देवी मीनाक्षी का।

क्या है थिरूकल्याणम

तमिल कैलेंडर के पहले महीने चितराई में मनाए जाने वाले चितराई उत्सव के पहले 12 दिन श्रद्धा से सराबोर मदुरई मनाता है अपने इष्ट देवी की महिमा का जश्न इस उत्सव का चरम है थिरूकल्याणम या मीनाक्षी सुंदरेश्वर यानी शिव का भव्य विवाह। इस समारोह का आयोजन मीनाक्षी अम्मन मंदिर में होता है। कला और वास्तुकला यह जीती जागती मिसाल बसा है पुराने शहर के बीचो बीच में जिसके चारों तरफ सड़कों का जाल बिछा हुआ है। करीब 14 एकड़ इलाके में बसा यह मंदिर दक्षिण के भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक हैं। यह मंदिर परिसर इतना प्राचीन है कि मंदिर का शुरुआती इतिहास किसी को पूरी तरह ज्ञात नहीं।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर के निर्माण की कहानी

मंदिर में बने कई भवन अलग-अलग काल के हैं इसमें सुंदरेश्वर और मीनाक्षी का पुण्य स्थल सबसे प्राचीन माने जाते हैं। इनका निर्माण 800 साल पहले पांड्या राजा कुलशेखरआ ने करवाया था। लेकिन चौदहवीं शताब्दी में राजनीतिक उथल-पुथल का असर इस मंदिर पर भी हुआ ज्यादातर हिस्से दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने नष्ट कर डाले। फिर कई सदियों तक राजा और धनवान सरपरस्त इस मंदिर का निर्माण और विस्तार करवाते रहें। लेकिन इसके वर्तमान रूप का मूल श्रेय 16 वी सदी के नायक वंश के राजाओं को जाता है जो नायक वंश से थे। मीनाक्षी अम्मन मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण है। यह गगनचुंबी गोपुरम मदुरई की पहचान है।

इस मंदिर में कुल 14 गोपुरम में जिनकी ऊंचाई और साज-सज्जा में अंतर है। बाहरी चार गोपुरम सबसे ऊंची और चारों मूल दिशाओं के सीध में हैं जिनसे मुख्य द्वार बना है। इनमें सबसे ऊंचा दक्षिणी गोपुरम है। जिसकी ऊंचाई 170 फीट है। सुंदरईश्वर मंदिर बीच में है जबकि मीनाक्षी मंदिर दक्षिण पश्चिम में हैं जबकि दोनों का रुख उगते सूरज की दिशा में है। और उनके अपने गोपुरम और सोने के परत जड़े विमान हैं।

मंदिर परिसर की शोभा बढ़ाता है पवित्र सरोवर खूबसूरती से सजे मंडप या हॉल हजारों नक्काशीदार स्तंभ शानदार गलियारे जिनके छतों पर नक्काशी की गई है और करीब 33000 प्रतिमाएं। मंडप का तो कोई जवाब नहीं है मंदिर के स्तंभों को एक चट्टान को काटकर बनाया गया है और ज्यादातर स्तंभ ग्रेनाइट या चरनोकाईट के हैं कई जगहों पर पांडय प्रतीक मछली भी नजर आती है। इस मंदिर के मुख्य देवी मीनाक्षी हैं।

मिथक कहते हैं कि एक संतानहीन पांडय राजा और उनकी पत्नी ने तीन स्तनों वाली मीनाक्षी को उसी समय गोद लिया जब वह यज्ञ की पवित्र अग्नि से पैदा हुई थी। उनका पालन पोषण एक योद्धा की तरह किया गया। मदुरई की महारानी मीनाक्षी अजये थी। वह युद्ध लड़ती हुई उत्तर में चली गई और कैलाश पर्वत पर उनकी मुलाकात हुई भगवान शिव से यहां उनके जन्म के समय की गई भविष्यवाणी सत्य हो गई उनका तीसरा स्तन गायब हो गया।

इसका मतलब था उन्हें अपना होने वाला पति मिल गया था मीनाक्षी भी पार्वती का ही अवतार थी और फिर मीनाक्षी सुंदरेश्वर शिव के साथ मदुरई वापस आई ताकि यहां उनसे विवाह रचा सकें। थिरूकल्याणम यानी विवाह उत्सव वैसे तो देवी मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर से जुड़ा है पर इस विवाह में कन्यादान भगवान विष्णु ने किया था उन्हें यहां अड़गड़ कहा जाता है। और उन्हें देवी मीनाक्षी का भाई माना जाता है। भगवान विष्णु के यहां आने से शैव और वैष्णो के उपासक एक हो गए।

17 वी सदी में सम्राट थिरुमणि नायक ने नई पहल की उन्होंने इस विवाह समारोह थिरूकल्याणम के उत्सव को आगे बढ़ा कर अप्रैल और मई में चितरई के महीने में कर दिया इस तरह से यह स्थानीय वैष्णो महोत्सव कलरगड़ के समय होने लगा सम्राट नायक ने ही मदुरई के वैगई नदी को कलरगड़ उत्सव का अंतिम पड़ाव बना दिया। इस तरह शिव और विष्णु भक्तों का मिलन होने लगा और कई महीनों तक चलने वाले इस उत्सव को चितिराई महोत्सव कहां गया।

इस उत्सव की अनुष्ठानों में इस मौके के लिए खास तरह से बनाई गई मूर्तियों का इस्तेमाल किया जाता है जो पंच धातु की बनी होती है देवी मीनाक्षी की असली मूर्ति कभी गर्भगृह से बाहर नहीं निकली जाती। https://bhojkhabar.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ad-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-2/

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