
वैसे तो कक्षा में शिक्षक अमूमन अरस्तु का नाम हमारे सामने लेते रहते हैं जब कोई विद्यार्थी दार्शनिक तरह की बात करें तो जिससे हमें आभास लग जाता है कि अरस्त कोई पढ़ा लिखा इंसान होगा। यह बात पूर्णता सत्य है कि अरस्तु एक महान दार्शनिक थे। जिन्होंने समाज में विद्यमान सभी विषयों पर अपना विचार और मत प्रकट किया। उन्होंने राजनीति शास्त्र, साहित्य, कला, विज्ञान आदि सभी विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत कर एक नए दर्शन को मानव के समक्ष स्थापित और प्रस्तुत किया।
अरस्तु महान यूनानी दार्शनिक प्लेटो के शिष्य थे। जब हम वैदिक ग्रंथो का अध्ययन करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि हमारे प्राचीन काल में भारतवर्ष में गुरुकुल की परंपरा थी जहां पर गुरु और शिष्य एक साथ रहकर अध्ययन और अध्यापन करते थे। गुरु और शिष्य की परंपरा भारत के अलावा अन्य देश में भी विद्यमान था। अरस्तु सिकंदर के गुरु थे। अरस्तु के अध्ययन को हम इसी तथ्य के माध्यम से समझ सकते हैं कि उन्होंने लगभग सभी विषयों पर 400 से अधिक ग्रंथो की रचना की थी।
इस लेख में अरस्तु का अध्ययन हम साहित्य के संदर्भ में करेंगे कि अरस्तू ने साहित्य में कौन से योगदान दिए हैं साथी साहित्य के लिए उनका विचार क्या था जब हम अरस्तु के साहित्य संबंधी विचारों का अध्ययन करते हैं तो इसका उल्लेख उनके दो प्रमुख ग्रंथो में मिलता है जिसका नाम Poetics (काव्यशास्त्र) और Rhetoric (भाषा शास्त्र) है।
अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत-
अनुकरण शब्द को यूनानी भाषा में मिमेसिस कहा जाता है। अनुकरण शब्द हिंदी भाषा में अंग्रेजी भाषा के इमिटेशन शब्द से रूपांतरित होकर आया है। यहां पर हमें यह बात ध्यान रखने की जरूरत है कि अनुकरण सिद्धांत का उल्लेख अरस्तु से पूर्व प्लेटो ने किया था। प्लेटो का मानना था कि काव्य व्याजय है। अर्थात प्लेटो या मानता था कि ईश्वर ही एकमात्र सत्य है और ईश्वर के द्वारा यह संसार बनाया गया है और इस संसार ने काव्य की संरचना की है इसलिए काव्य एक तरह से अनुकरण का अनुकरण है।
मेरा प्रश्न आप लोगों से है क्या हम कभी भी किसी का 100% अनुकरण कर सकते हैं। तो इसका उत्तर होगा नहीं क्योंकि जो चीज किसी भी व्यक्ति को प्रकृति द्वारा प्रदत्त है उसका कोई दूसरा हुबहू 100% अनुकरण कर ले ऐसा नहीं हो सकता जैसे की भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर उनकी मिमिक्री और एक्टिंग करते हुए लोग हम टीवी पर देखते हैं लेकिन वह मिमिक्री और एक्टिंग करने वाले लोग क्या मोदी के 100% गुणों का अनुकरण कर लेते हैं?
दूसरे अर्थों में हम यह कह सकते हैं कि अनुकरण सदैव अधूरा होता है अतः संसार को हम अर्धसत्य मान सकते हैं और काव्य को चौथाई सत्य इसलिए काव्य तीनचौथाई झूठ है इसलिए इसको व्याजय कहा गया है।
प्लेटो ने अनुकरण सिद्धांत को स्थूल अर्थों में व्याख्याित किया और इस आधार पर उसने काव्य के तीन भेद किए
कल्पना व्यक्ति को एक नए सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करता है जैसे कुछ समय पूर्व इंसान चांद पर जाने के सपने देखता था और उसकी कल्पना करता था आज इंसान चांद पर पहुंच गया इसमें कहीं ना कहीं उसके कल्पना और सोच का बहुत बड़ा योगदान है। इस प्रकार अरस्तू ने भी अनुकरण सिद्धांत को प्लेटो के बताएं अर्थों में लिया लेकिन अरस्तु ने अनुकरण सिद्धांत में कल्पना रूपी एक नया रंग भर दिया जिससे काव्य की महत्ता बढ़ गई और उसको समाज में स्थापित करने में उसको एक रास्ता मिल गया।
अरस्तु द्वारा प्रस्तुत किए गए अनुकरण शब्द को अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग अर्थों में उसकी व्याख्या करते हैं।
प्रोफेसर बूचर का मानना है कि सदृश्य विधान के माध्यम से मूल विषय वस्तु का पुनराख्यान ही अरस्तु द्वारा प्रयोग किए गए अनुकरण का अर्थ है।
जबकि प्रोफेसर मरे का मानना है कि अरस्तु के अनुकरण का अर्थ सर्जना का अभाव नहीं बल्कि पुनर्सृजन है।
अरस्तु प्रकृति के सौंदर्य से प्रेम करता था इसलिए उसने काव्य को सौंदर्यवादी दृष्टि से देखा और उसने काव्य को नीतिशास्त्र, राजनीतिक एवं दार्शनिक बंधनों से मुक्त रखा उसका मानना था कि ‘आर्ट इज़ द इमिटेशन ऑफ नेचर’ यानी की कला प्रकृति की अनुकृति है। अरस्तु के के अर्थों में प्रकृति का मतलब सिर्फ भौतिक जगत नहीं था बल्कि उसका आंतरिक रूप भी विद्यमान है जैसे की काम क्रोध लोभ मध्य मनोविकार आदि।
अरस्तु का मानना था कि हूबहू नकल करना अनुकरण नहीं है। उसका मानना था की प्रकृति के अनेक दोष और अभाव हैं। जिसको अनुकृति के माध्यम से कला द्वारा पूरे किए जाते हैं।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अनुकरण को केवल नकल नहीं कहा जा सकता उसमें कुछ मात्रात्मक गुण भी होते हैं। अनुकरण के माध्यम से हम इतिहासकार और कवि में अंतर भी स्पष्ट कर सकते हैं एक इतिहासकार केवल उन्हीं घटनाओं का वर्णन करता है जो पृथ्वी पर घट चुका है लेकिन एक कवि उस घटना का भी वर्णन करता है जो पृथ्वी पर आने वाले समय में घट सकता है। इसलिए काव्य का फलक बहुत विस्तृत और बड़ा है। जिसमें हम संपूर्ण चराचर जगत को समाहित कर सकते हैं।
अनुकरण की प्रक्रिया-
अरस्तु का मानना है कि एक कवि किसी वस्तु का वर्णन उस आधार पर नहीं करता कि जिस आधार पर वह पृथ्वी पर विद्यमान है बल्कि वह उसका वर्णन उन यथासंभव तर्कपूर्ण स्थितियों के आधार पर करता है कवि मानव जीवन की अभिव्यक्ति के लिए किसी वस्तु के सत्य को झुठला भी सकता है और उसमें परिवर्तन भी कर सकता है किसी काव्य में जब मानव का उल्लेख होता है तो कवि उस मानव को एक सामान्य मानव से एक उत्कृष्ट मानव भी बन सकता है कवि चाहे तो उसे एक निष्कृष्ट मानव भी बना सकता है या फिर उसका घोर यथार्थ भी काव्य में दिखा सकता है। ऐसा कवि इसलिए करता है क्योंकि इससे उसके हृदय को आनंद की प्राप्त होती है।
निष्कर्ष-
अरस्तु के अनुकरण सिद्धांत से जीवन के केवल बाह्य जगत पर ही प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि अनुकरण का प्रभावअंतर जगत में भी विद्यमान है। अरस्तु काव्य के लिए इस बात पर बल देता है की वस्तु कैसी है कि अपेक्षा वस्तु कैसी होनी चाहिए।
टिप्पण क्या है?…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/
कोई त्रुटि होने पर आप हमें निम्न मेल पे सूचित करें…bhojkhabar.com@gmail.com
फेसबुक पेज का पता…https://www.facebook.com/profile.php?id=61554846672680