मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ हिन्दी साहित्य की दुर्लभ रचनाओं में से एक है। यह उपन्यास न केवल दाम्पत्य जीवन की कटु सच्चाइयों को उजागर करता है, बल्कि एक छोटे से बालक की आंतरिक उथल-पुथल को इतनी गहराई से खंगालता है कि पाठक स्वयं उसकी तड़प में सम्मिलित हो जाते हैं। 1971 में प्रकाशित यह उपन्यास लगभग दो सौ पृष्ठों का है। फिर भी, इसकी परतें इतनी जटिल हैं कि यह वर्षों तक मन में गूंजता रहता है।
मन्नू भंडारी जो स्वयं एक संवेदनशील लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। इन्होंने इस उपन्यास में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताओं के साथ-साथ बाल-मनोविज्ञान की बारीकियाँ बुनी हैं। ‘आपका बंटी’ उनके उन प्रयासों का प्रतीक है, जहाँ वे सामाजिक यथार्थ को मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ जोड़ती हैं। यह उपन्यास तलाक की प्रक्रिया को केंद्र में रखकर एक सवाल पूछता है- एक बच्चा किसका होता है? माँ का, पिता का, या फिर उसकी अपनी अधूरी दुनिया का? शीर्षक ही इस प्रश्न को प्रतिबिम्बित करता है। ‘आपका’ शब्द एक व्यंग्य है, जो समाज की उदासीनता पर चोट करता है।
उपन्यास की शक्ति उसके पात्रों में निहित है। ये पात्र कथा को जीवंत बनाते हैं और बंटी की दुनिया को चारों ओर से घेरते हैं।
मुख्य नायक बंटी है—आठ वर्ष का एक नन्हा बालक, जिसकी आँखों से पूरी कहानी गुजरती है। वह जिद्दी तो है, लेकिन उस जिद के पीछे छिपी असुरक्षा की परतें इतनी महीन हैं कि वे पाठक को झकझोर देती हैं। बंटी की दुनिया रंगीन सपनों और काले डरों के बीच लटकी रहती है। कभी वह लोककथाओं के राजकुमार बन जाता है, तो कभी माँ की अनुपस्थिति में खोकर रो पड़ता है।
शकुन, बंटी की माँ, एक उच्च शिक्षित महिला है। वह कॉलेज की प्रिंसिपल के पद पर आसीन है। उसका जीवन बंटी के इर्द-गिर्द घूमता है, लेकिन यही अंधा स्नेह बंटी को और अधिक कमजोर बनाता है। शकुन की उदासी, उसके आंसुओं में छिपा अपराध बोध- ये सब बंटी के मन पर बोझ बन जाते हैं।
अजय, बंटी का पिता, महत्वाकांक्षी है। वह कलकत्ता में नई जिंदगी बसा चुका है, मीरा नामक दूसरी पत्नी के साथ। वह बंटी से प्यार तो करता है, लेकिन वह प्यार क्षण भंगुर है। खिलौनों से भरा, लेकिन भावनात्मक गहराई से खाली।
फूफी, बंटी की धाय माँ, ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली है। वह बंटी को अपना खून मानती है। उसकी विदाई बंटी के लिए पहली बड़ी चोट है।डॉ. जोशी, शकुन का दूसरा पति, एक विधुर प्रोफेसर है। उसके दो बच्चे हैं। वह बंटी के प्रति कठोर है, जो विद्रोह की जड़ बनती है।
अन्य पात्र जैसे अनि (डॉ. जोशी का छोटा बेटा, जो बंटी का प्रतिद्वंद्वी है), मीरा (अजय की नई पत्नी, जो बंटी को पराया महसूस कराती है), माली दादा (बंटी का खेल-साथी, जो प्रकृति से जोड़ता है), और दीपा आंटी (कॉलेज की सहकर्मी, जो सतही तारीफों की दुनिया दिखाती है)—ये सभी बंटी की मनोदशा को और जटिल बनाते हैं। ये पात्र न केवल कथा को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि बंटी के मन की आईनों की तरह काम करते हैं। वह अपनी असुरक्षा को बार-बार देखता है।
कथा का आरंभ बंटी के दैनिक जीवन से होता है। यह जीवन सतही शांत दिखता है लेकिन अंदर से उफान भरा। सुबह की धूप में बंगला जागता है। शकुन कॉलेज के लिए तैयार होती है। फूफी बंटी को नहलाती है। दलिया का कटोरा सामने आता है, लेकिन बंटी की जिद भड़क उठती है। वह कटोरा उछाल देता है। दलिया दीवार पर सन जाता है।
यह छोटी सी विद्रोह की घटना बंटी के मन की गहरी पीड़ा का प्रतीक है। क्यों माँ हमेशा भागी रहती है? क्यों पिता की जगह खाली है? बंटी का मन चुपके से सोचता है। अगर माँ घर पर रहें, तो वह कभी दलिया नहीं फेंकेगा।
लॉन में माली दादा के साथ पानी देना उसके लिए एकमात्र सांत्वना है। वह आम की गुठली बोता है। कल्पना करता है कि यह बड़ा पेड़ बनेगा, जो उसके परिवार को छाया देगा। लेकिन पड़ोस की दीवारों से आने वाली हंसी-ठिठोली उसे चुभती है। वहाँ बच्चे अपने माँ-बाप के साथ खेलते हैं, जबकि बंटी अकेला। उसके मन में एक सवाल बार-बार गूंजता है : मैं क्यों अलग हूं? यह असुरक्षा धीरे-धीरे उसके खेल में घुस आती है। वह पेड़ पर चढ़ जाता है, जैसे ऊँचाई से सब कुछ छोटा हो जाए।
गर्मियों की छुट्टियाँ आती हैं, लेकिन बंटी की दुनिया सिकुड़ जाती है। कोई घूमने का प्लान नहीं। बस बंगले की चारदीवारी। रातें लोककथाओं से भरी होती हैं। फूफी राजा-रानी की कहानियाँ सुनाती है। वहाँ डायन रूप बदल लेती है। जादू से सब ठीक हो जाता है। बंटी इनमें खो जाता है। सोचता है कि शायद उसके पिता भी जादू से लौट आएं। लेकिन ये कल्पनाएं उसके डर को और गहरा करती हैं। क्या माँ भी रूप बदल लेंगी? क्या वह खुद को भूल जाएगा?
कभी-कभी अजय कलकत्ता से आता है। ट्रेन की सीटी की आवाज बंटी के दिल को धड़काती है। पिता एयरगन या आइसक्रीम लाते हैं। बंटी हंसता है, लेकिन अंदर से एक खालीपन महसूस करता है। पिता की नजरें भटकती हैं। फोन की घंटी बजती है। मीरा का नाम आता है। बंटी सोचता है, ‘पापा, सिर्फ मेरे हो जाओ न!’ एक बार सर्किट हाउस में रुकने पर बंटी जिद करता है कि माँ भी आएं।
वहां की बातें—तलाक के कागजात, वकील की फुसफुसाहट—उसके कानों में गूंजती हैं। वह समझता नहीं, लेकिन महसूस करता है कि कुछ टूट रहा है। रात को बिस्तर पर लेटे हुए वह छत को घूरता रहता है। आंसू चुपके से बहते हैं। यह बंटी की मनोदशा का पहला मोड़ है—जिज्ञासा से चिंता की ओर।
तलाक की प्रक्रिया तेज होती है। वकील चाचा आते हैं, कागजों का पुलिंदा लिए। शकुन के चेहरे पर बादल छा जाते हैं। वह बंटी को गले लगाकर रोती है। बंटी का छोटा मन भ्रमित हो जाता है। माँ नाराज क्यों हैं? क्या मैंने खिलौना तोड़ दिया? वह चुप रहता है, लेकिन अंदर से एक तूफान उठता है।
डॉ. जोशी का आना-जाना शुरू हो जाता है। वह किताबों से लदा, चश्मा चढ़ाए, शकुन से गंभीर बातें करता है। दीपा आंटी आती है। बंटी की तारीफ करती है—’कितना होशियार बच्चा!’ लेकिन बंटी को लगता है कि यह झूठ है। सिर्फ माँ को खुश करने के लिए। उसके मन में ईर्ष्या जागती है। डॉ. चाचा कौन? क्यों माँ उनके साथ हंसती है? एक दिन अजय फिर आता है। एयरगन देता है।
बंटी उत्साहित होता है, लेकिन गुस्से में पड़ोस के पेड़ पर गोली चला देता है। आवाज गूंजती है। माली दादा दौड़ता है। बंटी रोता है। अपना पौधा पापा को दिखाता है—’देखो पापा, यह उग आया!’ लेकिन अजय का ध्यान कहीं और है। यह घटना बंटी के क्रोध को हवा देती है। पिता से प्रेम, लेकिन घृणा का बीज भी। वह सोचता है, ‘तुम्हें मेरी जरूरत नहीं, तो मुझे तुम्हारी क्यों?’
तलाक अंततः हो जाता है। अजय कलकत्ता लौट जाता है, मीरा के आगोश में। शकुन टूट जाती है, लेकिन डॉ. जोशी का सहारा उसे जोड़ता है। शादी का फैसला होता है। बंटी को कुछ समझ नहीं आता, लेकिन हवा में तनाव महसूस करता है। फूफी, जो बंटी का सच्चा सहारा थी, इस खबर से आहत हो जाती है। वह कहती है, ‘बंटी को ऐसे तोड़ोगी?’ और हरिद्वार चली जाती है। बंटी का दिल फट जाता है।
फूफी के बिना सुबह की धुलाई, दलिया की मिठास—सब सूना। चपरासी आता है, लेकिन उसका स्पर्श फूफी जैसा नहीं। बंटी रातों को जागता रहता है। फूफी की कहानियां याद करता है, लेकिन वे अब डरावनी लगती हैं। पढ़ाई में मन नहीं लगता। खेलना भूल जाता है। वह लॉन में अकेला बैठता है। पौधे से बातें करता है—’तू तो मेरे साथ है न?’ यह अलगाव बंटी की मनोदशा को गहरा अवसाद की ओर धकेलता है। निर्भरता टूटने का दर्द।
शादी के बाद शकुन और बंटी डॉ. जोशी की कोठी में चले जाते हैं। वहाँ का लॉन, पेड़। सब बंटी का अपना था। कोठी राजसी है। चमचमाते फर्श, सजे बगीचे, नौकरों की फौज। लेकिन बंटी के लिए यह जेल है। डॉ. जोशी का स्वागत ठंडा है। ‘अनुशासन सिखाओ बच्चे को।’ अनि, जोशी का छोटा बेटा, बंटी का दुश्मन बन जाता है। दोनों मेज पर झगड़ते हैं। खिलौनों पर।
एक दिन अनि बंटी को काट लेता है। खून निकलता है। बंटी चीखता है, लेकिन डॉ. जोशी डांटते हैं—’झगड़ा मत करो!’ स्कूल कार से जाता है, लेकिन पुरानी साइकिल की सवारी याद आती है। रातें सबसे कष्टदायक हैं। बंटी माँ के साथ सोता है। लेकिन एक रात डॉ. जोशी आ जाते हैं। बंटी जाग जाता है।
माँ और जोशी को बिस्तर पर देखता है—नग्न, गले मिले। उसके मन में एक झटका लगता है, जैसे कोई पाप हो गया। वह बिस्तर गीला कर देता है। पेशाब से। सुबह शर्म से डूब जाता है। खुद को गंदा समझता है। यह दृश्य बंटी की मनोदशा का चरम है। वह खाना फेंकता है। चीजें तोड़ता है। शकुन रोती है, लेकिन बंटी का दर्द समझ नहीं पाती।
अंततः फैसला आता है। बंटी को पिता के पास कलकत्ता भेज दो। शकुन सहमत हो जाती है। बंटी भी गुस्से में माँ से दूर जाने का फैसला लेता है लेकिन दूर जाते हुए पीड़ा होती है। बंटी ट्रेन में बैठता है। अजनबी चेहरे घूरते हैं। कलकत्ता पहुंचता है। भीड़भाड़, छोटा घर।
मीरा का शिशु रोता है, लेकिन बंटी को कुछ नहीं लगता। वह सौतला महसूस करता है। बोलता नहीं। पिता स्कूल भेजते हैं, लेकिन टेस्ट में फेल। अजय निराश होते हैं। हॉस्टल का फैसला होता है। लोकल ट्रेन में जाते हुए बंटी फूट-फूटकर रोता है। ‘माँ… फूफी… घर…’। कथा यहीं थम जाती है, लेकिन बंटी की पीड़ा अनंत है।
उपन्यास की यह कथा बंटी के दिल के जख्मों को इतनी बारीकी से उकेरती है कि पाठक का अपना दिल दर्द से भर जाता है। मिसाल के तौर पर, जब बंटी माँ के साथ की दूरी और जरूरत महसूस करता है, तो लेखिका लिखती हैं: “क्या इतने बड़े लोग भी लड़ते हैं? ऐसी लड़ाई, जिसमें कभी दोस्ती ही न हो। क्या मम्मी को पापा की याद नहीं आती होगी?” यह पंक्ति बंटी के भोलेपन और उसकी मनःस्थिति को उजागर करती है, जहाँ तलाक बच्चे के लिए त्रासदी है।
‘आपका बंटी’ उपन्यास की मनोवैज्ञानिक गहराई-
‘आपका बंटी’ की असली ताकत बंटी की मनोदशा में है। लेखिका ने उसके मन को एक कांच की तरह उकेरा है। हर दरार दिखाई देती है। असुरक्षा की शुरुआत माँ की अनुपस्थिति से होती है। यह निर्भरता जन्म देती है। जिद उसके विद्रोह का रूप है। दलिया फेंकना, पेड़ पर चढ़ना। तलाक की खबरें उसके मन में भ्रम पैदा करती हैं। जो चिंता में बदल जाती हैं।
फूफी की विदाई उसे अकेलापन सिखाती है। जबकि कोठी का परिवर्तन परायापन। नग्न दृश्य अपराधबोध का बीज बोता है। जो किशोरावस्था की पूर्वसूचना है। कलकत्ता में सौतलापन उसे पूर्ण विखंडन की ओर ले जाता है। कथानक में तलाक की क्रूरता प्रमुख है। माता-पिता का अहं परिवार तोड़ता है, लेकिन बच्चे की आत्मा चूर हो जाती है। लाड़-प्यार की अधिकता स्वतंत्रता छीनती है। नई शादी विद्रोह को जन्म देती है। लोककथाएं वास्तविकता से टकराती हैं। डर को सपनों में बदल देती हैं। उपन्यास समाज को आईना दिखाता है। “बच्चे की पीड़ा को अनदेखा न करें।“
‘आपका बंटी’ एक मार्मिक चित्रण है। यह बंटी के माध्यम से हम सभी को छूता है। मन्नू भंडारी ने न केवल कथा बुनी, बल्कि एक भावना रची है। बच्चा संपत्ति नहीं, एक जीवंत आत्मा है। यह उपन्यास पढ़कर पाठक बंटी की आंखों से दुनिया देखता है। और सवाल करता है—आपका बंटी कौन है?
~ एम.डी तल्हा, परास्नातक हिन्दी विभाग ( दिल्ली विश्वविद्यालय )
‘झूठा सच’ ~ यशपाल…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%9a/
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