हिंदी कहानी

कहानी गद्य साहित्य की विश्व जगत में बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय विद्या है। मानव समाज और संस्कृति को बनाए रखने तथा उसे अनंत काल तक सुरक्षित रखने के लिए जिस विद्या ने सर्वाधिक योगदान दिया उसमें कहानी का स्थान सर्वोपरि है।

कहानी का उदभव –

हमारे समाज में कहानी की परंपरा अनंत काल से चली आ रही है। उदाहरण के लिए पंचतंत्र की कथाएं जातक कथाएं हितोपदेश कथासरित्सागर आदि रचनाएं कहानी के स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं।आज के दौर में कहानी का स्वरूप पारंपरिक कथाओं के स्वरूप से अलग मानी जाती है। 

कहानी और कथा में क्या अंतर है इस प्रश्न को लेकर हम अक्सर दुविधा में रहते हैं। तो यहां हमें जान लेना चाहिए की कहानी और कथा में ना तो आकर का अंतर है। और नहीं भाषा का अंतर है। इसमें जो मूल अंतर है वह है दृष्टिकोण का। जहां कथा में आदर्शवादी तथा नैतिकतावादी दृष्टिकोण होता है। वहीं वर्तमान दौर के कहानी में यथार्थवादी दृष्टिकोण होता है।

अगर हम पारंपरिक कथाओं की बात करें तो, उनका मूल उद्देश्य समाज को नैतिक शिक्षा प्रदान करना होता था। पारंपरिक कथाओं के कथाकार कथा का हमेशा हैप्पी एंडिंग करते थे और अंत में वह बताते थे कि इस कहानी से हमें क्या शिक्षा प्राप्त हुई और इस शिक्षा और उद्देश्य के अनुसार कथाकार अपने पत्रों घटनाओं और कथानक को बुनता और सजाता था। इन्हीं तत्वों के माध्यम से कथा के अंत में कथाकार एक नैतिक शिक्षा समाज को देने में सफल होता था। इसलिए कहा जाता है कि जो पारंपरिक कथाएं होती थी। वह आदर्शवादी और नैतिकतावादी दृष्टिकोण को अपने ऊपर ओढ़ रहती थी।

जब हम हिंदी साहित्य में कहानी के आगमन की बात करते हैं। तो उसका संदर्भ अंग्रेजी के शॉर्ट स्टोरी मोमेंट से प्रभावित है। जब अंग्रेज भारत आए तो वह अपने साथ अपने साहित्य और संस्कृति को भी भारत लाए। और जैसे ही भारतीय समाज का अंग्रेजों के साहित्य और संस्कृति से परिचय हुआ तो अंग्रेजों की साहित्यिक प्रवृत्तियां जिसमें कहानी भी शामिल थी बंगाल से होते हुए हिंदी जगत में पहुंची।

अंग्रेजी कहानी रियलिज्म से प्रभावित थी। क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ण यथार्थवाद होता था। वह अपनी कहानियों में कल्पनाओं को बहुत ही कम स्थान देते थे। इसका ही परिणाम है कि हिंदी साहित्य में भी पश्चिमी यथार्थवाद से प्रभावित कहानियां लिखी जाने लगी।

किसी भी व्यक्ति के जीवन में बहुत सारी घटनाएं घटती है। उसके जीवन में घटित सभी घटनाएं महत्वपूर्ण नहीं होती। जब कोई लेखक जीवन के किसी एक प्रसंग, किसी एक घटना या मनःस्थिति को वर्णन करता है। साथ ही वह घटना या वर्णन अपने आप में पूर्ण होना चाहिए। ताकि जिससे पाठक को पूरी घटना और प्रसन्न का पता चल सके। कहानी की परिभाषा देते हुए कहा जा सकता है कि वह ऐसा आख्यान है दो यथार्थ का उद्घाटन करता है आकार में छोटा होता है इसी एक बार में पढ़ा जा सकता है।

अगर हम हिंदी कहानी के स्वरुप की बात करें तो लगभग सभी कहानियां दो तरह के कलेवर ओढ़ रहती हैं। यातो वह पूर्णतः आदर्शवादी या नैतिक वादी शिक्षा देती हैं। यातो वह पूर्णता यथार्थवाद को दर्शाती हैं। कहानीकार इन्हीं में से किन्हीं एक तत्व को चुनकर अपनी कहानी लिखता है। कभी-कभी कहानीकार अपनी कहानी में आदर्शवाद और यथार्थवाद दोनों को भी शामिल करता है। पर अंतत कहानीकार का मुख्य उद्देश्य पाठक को उसे कहानी का मर्म समझाना होता है।

कहानी के तत्व-

उस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? इसे भी पाठक को समझाना कहानीकार का मुख्य दायित्व होता है। कहानीकार कहानी के मर्म को समझने के लिए या कहें तो कहानी को लिखने के लिए वह छह तत्वों का प्रयोग करता है। जो इस प्रकार है- कथानक, चरित्र, वातावरण, उद्देश्य, भाषा शैली तथा संवाद. कोई भी कहानीकार इन्हीं 6 तत्वों का प्रयोग करके अपनी कहानी की रचना करता है। या फिर कहें तो इन्हीं 6 तत्वों के माध्यम से अपनी कहानी का उद्देश्य और मर्म पाठक के सामने रखता है। इन्हीं 6  तत्वों के माध्यम से समाज में एक नई चेतना जागृत करता है। कहानी हिंदी गद्य विद्या का प्रमुख विषय है।

इस लेख में हम कहानी की कुछ विशेषताओं को जानेंगे तदुपरांत इसके अगले लेख में कहानी लेखन के छह तत्वों के बारे में पढेंगे। कहानी को अच्छी तरह से समझने के लिए हम यहां पर उपन्यास का भी सहारा लेंगे। क्योंकि कहानी और उपन्यास दोनों हिंदी साहित्य की प्रमुख गद्य विधा हैं। जिससे हमें कहानी को समझने में और आसानी होगा। यहां पर हमें यह समझना होगा हम कहानी और उपन्यास को आकर के आधार पर नहीं समझेंगे। कुछ लोग सोचते होंगे की कहानी आकार में छोटा होता है और उपन्यास आकार में बड़ा होता है। 

कुछ विद्वान इस बात को मान भी लेते हैं कि- कहानी एक लघु उपन्यास है और उपन्यास एक लंबी कहानी लेकिन इस विषय पर बाबू गुलाब राय और प्रेमचंद का विचार बिल्कुल भिन्न है. यह दोनों विचारक मानते हैं कि कहानी और उपन्यास यह दोनों विधाएं अपनी मूल प्रकृति में भिन्न होती हैं. बाबू गुलाब राय ने उन विद्वानों पर व्यंग कर कहा है कि जो मानते हैं की कहानी और उपन्यास में मात्र आकर भर का अंतर है. बाबू गुलाब राय कहते भी हैं कि “कहानी को लघु उपन्यास कहना वैसा ही होगा जैसे चौपाया होने की समानता के आधार पर मेंढक को छोटा बैल और बैल को बड़ा मेंढक कहें”

कहानी के स्वरूप को विधवत समझने के लिए हमें उपन्यास के साथ कहानी का तुलनात्मक अध्ययन करना पड़ेगा. तभी हम कहानी के स्वरूप को समझ सकेंगे साथ ही कहानी और उपन्यास के मध्य क्या मौलिक अंतर है उसको भी जान पाएंगे।

कहानी के संदर्भ में प्रेमचंद जी का कहना है कि कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक रचना मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है उसके चरित्र उसकी शैली उसका कथा विन्यास सभी इस एक भाव को स्पष्ट करते हैं. उपन्यास की भांति उसमें मानव जीवन का संपूर्ण बृहद रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता ना ही. उसमें उपन्यास की भांति सभी रसों को संरक्षण होता है वह ऐसा रमणीय उद्यान नहीं जिसमें भांति-भांति के फूल बेल बूटे सजे हुए हैं. बल्कि यह एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है।

प्रेमचंद जी ने उपायुक्त वक्तव्य से एक तीर से दो निशाना लगाया है अर्थात उन्होंने एक कथन के माध्यम से ही उपन्यास और कहानी का बेसिक अंतर या कहे मौलिक अंतर पाठकों को समझा दिया है. उनका कहने का मतलब है कि उपन्यास में संपूर्ण जीवन का वर्णन होता है अगर इसको हम सरल शब्दों में कहे तो व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक की कहानी उपन्यास में हो सकती है. लेकिन कहानी में उस व्यक्ति के जीवन के किसी एक घटना किसी एक मनोभाव या किसी एक अंग का वर्णन हो सकता है।

गति को आधार लेकर डॉक्टर गणपति चंद्रगुप्त ने उपन्यासकार और कहानीकार की तुलना क्रमशः बैलगाड़ी और हवाई जहाज के यात्रियों से की है। अर्थात उनके कहने का मतलब यह है कि उपन्यास की गति अत्यंत धीमी होती है जबकि कहानी की गति अत्यंत तीव्र होती है।

सामान्यतः उपन्यास में पात्रों की संख्या बहुत अधिक होती है जबकि कहानी में पात्रों की संख्या बहुत कम होती है।

निष्कर्ष-

अधिकतर कहानियों में एक ही घटना, एक ही मनोभाव तथा एक ही विचार पर आधारित कथा को प्रस्तुत किया जाता है। जबकि उपन्यास में मुख्य कथा के समानांतर कई अन्य सारी कथाएं भी चलती रहती हैं। उपन्यास विस्तृत होने के कारण उसमें चरित्रों का विस्तृत वर्णन होता है। जबकि कहानी में इसका अभाव होता है। बस एक जानकारी के रूप में पात्र का चरित्र चित्रण किया जाता है।

रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्वhttps://bhojkhabar.com/%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a5%82/

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