समीक्षा- ‘तीसरी कसम’ फणीश्वर नाथ ‘रेणु’

हिंदी कथा-साहित्य में आंचलिक चेतना को कलात्मक गरिमा और साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले रचनाकारों में फणीश्वरनाथ रेणु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। रेणु ने हिंदी कहानी को शहरी बौद्धिकता, कृत्रिम सौंदर्यबोध और अमूर्त आदर्शवाद से मुक्त कर उसे ग्राम्य जीवन की ठोस वास्तविकताओं, संवेदनाओं और संघर्षों से जोड़ा। उनकी कहानियाँ केवल कथात्मक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे ग्रामीण भारत की सामूहिक चेतना, लोक-संस्कृति, सामाजिक संरचना, वर्गीय विभाजन और मानवीय अनुभूतियों का जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत करती हैं।

रेणु का कथा-संसार उन लोगों का संसार है, जो इतिहास के केंद्र में नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़े हैं—गाड़ीवान, किसान, मजदूर, नर्तकी, लोकगायक। इन पात्रों के माध्यम से रेणु उस भारत की आत्मा को पकड़ते हैं, जो शहरों की चकाचौंध से दूर, अपनी पीड़ा और आनंद को लोकगीतों, कथाओं और स्मृतियों में संजोए हुए है।

‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ रेणु की सर्वाधिक चर्चित, बहुस्तरीय और भावात्मक रूप से सघन कहानियों में से एक है। यह कहानी प्रेम, मर्यादा, सामाजिक बंधन और आत्मिक पीड़ा की कथा है। इसमें लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता से यह रेखांकित किया है कि ग्रामीण समाज में प्रेम किस प्रकार सहज रूप से जन्म लेता है, लोक-संस्कृति की छाया में विकसित होता है और अंततः सामाजिक यथार्थ, लोकलाज तथा नैतिक रूढ़ियों के दबाव में मौन हो जाता है। यह कहानी नायक-नायिका के मिलन की नहीं, बल्कि प्रेम के अधूरे रह जाने की त्रासदी की कहानी है, जो अपने मौन में अधिक प्रभावशाली हो उठती है।

‘तीसरी कसम’ की कथानक या सारांश-

‘तीसरी कसम’ का कथानक हीरामन नामक एक साधारण बैलगाड़ी चालक के जीवनानुभवों के माध्यम से विकसित होता है। हीरामन पूर्णिया जिले का निवासी है, जो अपनी गाड़ी और अपने बैलों को ही अपना संसार मानता है। उसका जीवन किसी सुव्यवस्थित दार्शनिक सिद्धांत से नहीं, बल्कि अनुभवों से उपजी कसमों से संचालित होता है।

कहानी की शुरुआत हीरामन के अतीत से होती है, जब वह नेपाल से तस्करी का माल भारत लाया करता था। एक बार जब एक सेठ का माल पकड़ा जाता है और हीरामन को जान बचाकर अंधेरे में भागना पड़ता है, तब वह भय और आत्मग्लानि से भरकर पहली कसम खाता है कि वह जीवन में कभी चोरी या तस्करी का माल नहीं ढोएगा। यह कसम उसके नैतिक बोध और आत्मसंरक्षण की प्रवृत्ति का परिचायक है।

इसके पश्चात हीरामन बाँस ढोने का कार्य करने लगता है। यह कार्य भी उसके लिए कष्टदायक सिद्ध होता है। एक दुर्घटना में उसे शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ सामाजिक अपमान सहना पड़ता है, जब एक बग्घीवाला उसे कोड़े से मारता है। इस अनुभव से आहत होकर वह दूसरी कसम खाता है कि वह अब कभी बाँस नहीं ढोएगा। यहाँ दूसरी कसम उसके आत्मसम्मान, श्रमजीवी जीवन की कठिनाइयों और सामाजिक अन्याय के प्रति उसकी असहाय प्रतिक्रिया को व्यक्त करती है।

कहानी का केंद्रीय और सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग तब आता है जब फारबिसगंज के मेले में नौटंकी की नर्तकी हीराबाई उसकी गाड़ी में सवार होती है। समाज में नाचने वाली स्त्रियों को लेकर व्याप्त नैतिक भ्रांतियाँ और रूढ़ धारणाएँ हीरामन के मन में पहले से मौजूद हैं, फिर भी परिस्थितियाँ उसे तीसरी कसम तोड़ने के लिए विवश कर देती हैं।

गाड़ी की इस यात्रा के दौरान हीरामन और हीराबाई के बीच एक ऐसा संबंध विकसित होता है, जो न तो शारीरिक है और न ही सामाजिक रूप से स्वीकृत, बल्कि पूर्णतः आत्मिक, भावनात्मक और संवेदनात्मक है। लोकगीतों, लोककथाओं, नदी, रास्तों और प्रकृति के सान्निध्य में यह संबंध गहराता जाता है। किंतु सामाजिक मर्यादाएँ, लोकलाज और यथार्थ इस प्रेम को पूर्णता प्राप्त नहीं करने देते। अंततः हीराबाई विदा लेती है और हीरामन तीसरी कसम खाता है कि वह अब कभी किसी नाचने वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बैठाएगा। यह कसम प्रेम से उपजी नहीं, बल्कि प्रेम की विफलता से जन्मी पीड़ा और आत्मसंयम की अभिव्यक्ति है।

पात्र विश्लेषण-

हीरामन

हीरामन इस कहानी का केंद्रीय पात्र और संवेदना का प्रमुख वाहक है। वह अत्यंत भोला, ईमानदार, परिश्रमी और भावुक ग्रामीण युवक है। उसका व्यक्तित्व किसी बौद्धिक चतुराई या सामाजिक चालाकी से निर्मित नहीं, बल्कि सहज मानवीय अनुभूतियों और लोक-संस्कारों से निर्मित है।

हीरामन का प्रेम न तो वासना पर आधारित है और न ही स्वार्थपरक। वह हीराबाई को पाने की आकांक्षा नहीं रखता, बल्कि उसे सम्मान, श्रद्धा और आत्मीयता की दृष्टि से देखता है। यही कारण है कि उसका प्रेम शब्दों में व्यक्त नहीं होता, बल्कि मौन में पलता है और भीतर ही भीतर उसे पीड़ा देता है। हीरामन का चरित्र ग्रामीण समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो अत्यंत संवेदनशील होते हुए भी सामाजिक बंधनों के कारण अपने भाव व्यक्त करने में असमर्थ रहता है।

हीराबाई

हीराबाई एक नर्तकी होते हुए भी सामान्य सामाजिक छवि से सर्वथा भिन्न है। वह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संवेदनशील, आत्मसम्मानी और विवेकशील स्त्री है। लोकगीतों और लोककथाओं में उसकी रुचि उसके भीतर की सांस्कृतिक चेतना और भावनात्मक गहराई को उद्घाटित करती है।

वह हीरामन के प्रेम को समझती है, किंतु सामाजिक मर्यादा, लोकलाज और अपने यथार्थ से भी भली-भाँति परिचित है। उसका चरित्र यह स्पष्ट करता है कि नाचने वाली स्त्रियाँ भी भावनाओं से युक्त पूर्ण मनुष्य होती हैं, किंतु समाज उन्हें वस्तु में परिवर्तित कर देता है।

अन्य पात्र

धुन्नीराम, पलटदास, लालमोहर गाड़ीवान, हीरामन की भाभी और भाई जैसे पात्र कहानी को सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हैं। ये पात्र ग्रामीण समाज की सामूहिक मानसिकता, नैतिक रूढ़ियों और वर्गीय दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा कथा को यथार्थपरक बनाते हैं।

भाषा-शैली

फणीश्वरनाथ रेणु की भाषा ‘तीसरी कसम’ की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने इस कहानी में परंपरागत शुद्ध साहित्यिक भाषा के स्थान पर आंचलिक, लोकप्रचलित और जनभाषा का प्रयोग किया है। यह भाषा केवल संवादों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे कथ्य को जीवन्तता प्रदान करती है।

लोकगीत, कहावतें, ग्रामीण मुहावरे, प्रकृति-चित्रण और लोककथाएँ कथा में ऐसा वातावरण निर्मित करती हैं, जिसमें पाठक स्वयं को उसी ग्रामीण परिवेश में उपस्थित अनुभव करता है। भाषा में कृत्रिम अलंकारिकता नहीं, बल्कि भावनात्मक सघनता और सांस्कृतिक गहराई है। यही कारण है कि कथा पाठक के मन पर गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ती है।

उद्देश्य और विषयवस्तु-

‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ की विषयवस्तु मानवीय संवेदना, प्रेम और सामाजिक मर्यादा के अंतर्संघर्ष पर केंद्रित है। यह कहानी केवल एक गाड़ीवान और एक नर्तकी के अल्पकालिक सहवास की कथा नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज की उस मानसिक संरचना को उद्घाटित करती है, जहाँ प्रेम सहज रूप में जन्म तो लेता है, परंतु सामाजिक रूढ़ियों और लोकलाज के दबाव में मौन हो जाता है।

इस कहानी का केंद्रीय विषय प्रेम की वह पीड़ा है, जो अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मसंयम और त्याग के माध्यम से प्रकट होती है। हीरामन और हीराबाई का संबंध न तो वासना पर आधारित है और न ही विद्रोहात्मक; वह लोकगीतों, कथाओं और अनकहे भावों में पनपता है। रेणु यह संकेत करते हैं कि ग्रामीण समाज में प्रेम शब्दों से अधिक अनुभूति का विषय है।

कहानी का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य नाचने वाली स्त्री के प्रति समाज की रूढ़ दृष्टि पर प्रश्न उठाना भी है। हीराबाई को संवेदनशील और सांस्कृतिक चेतना से युक्त स्त्री के रूप में प्रस्तुत कर लेखक सामाजिक नैतिकता की एकांगी समझ को चुनौती देता है।

तीनों कसमें हीरामन के नैतिक विकास की अवस्थाएँ हैं। ये कसमें धार्मिक उपदेशों से नहीं, बल्कि जीवनानुभवों से उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार रेणु यह प्रतिपादित करते हैं कि नैतिकता अनुभवजन्य होती है।

निष्कर्ष-

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ हिंदी कहानी साहित्य की एक कालजयी रचना है। यह कहानी बिना किसी नाटकीयता या शोरगुल के, अत्यंत शांत और संवेदनशील स्वर में प्रेम की गहरी पीड़ा को अभिव्यक्त करती है।

मेरे मत में यह कहानी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि प्रेम का सबसे सुंदर और उदात्त रूप वह होता है, जो त्याग, मौन और आत्मसंयम में व्यक्त होता है। फणीश्वरनाथ रेणु ने इस कहानी के माध्यम से ग्रामीण भारत की आत्मा को शब्द दिए हैं। यही कारण है कि यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक, प्रभावशाली और साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है।

~ नेहा, परास्नातक हिन्दी विभाग ( दिल्ली विश्वविद्यालय )

कहानी : स्वरूप और विशेषताएँ…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%8f/

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