संप्रेषण की अवधारणा

अपनी संवेदना, विचार और भावनाओं को किसी अन्य व्यक्ति के साथ में साझा करने को संप्रेषण कहते हैं। संप्रेषण आज के समय में एक सामान्य सी प्रक्रिया है। जो समाज में उपस्थिति हर व्यक्ति एक दूसरे के साथ करता है। लेकिन क्या वह संप्रेषण सार्थक है या निरर्थक है? इसका निर्धारण हम कैसे करेंगे? यह भी जानना बहुत जरूरी है क्योंकि एक सार्थक संप्रेषण, एक सार्थक समाज का निर्माण करता है। जो राष्ट्र की उन्नति में अपना योगदान देता है।

संप्रेषण की अवधारणा-

कोई विचार, भावना, संवेदना आदि क्यों विद्यमान है? उसके पीछे की क्या अवधारणा है? आदि जानना बहुत आवश्यक है। यह जानकारी हमें इसलिए आवश्यक है कि ताकि हम उस अवधारणा और विचार को अच्छे से समझ सके।

संप्रेषण शब्द की व्युत्पत्ति अंग्रेजी भाषा के कम्युनिकेशन शब्द से हुआ है। वही कम्युनिकेशन शब्द का निर्माण लैटिन भाषा के ‘कम्युनिस’ शब्द से बना है। जिसका मूल अर्थ संप्रेषण है।

संप्रेषण के माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति तक अपने विचार, भावनाएं, संवेदना आदि साझा करता है। ऐसा नहीं है कि वह व्यक्ति उस पर विश्वास कर रहा है। तभी अपने विचार संवेदना और भावनाओं को संप्रेषित कर रहा है। बिना विश्वास के भी कोई व्यक्ति संप्रेषण कर सकता है।

सम्प्रेषण का विकास-

मानव की उत्पत्ति से ही संप्रेषण की प्रक्रिया चल रही है। जब भाषा नहीं था तब संप्रेषण का माध्यम शारीरिक हाव-भाव और संकेत हुआ करते थे। लेकिन जैसे ही भाषा का विकास हुआ और मानव जाति किसी ने किसी भाषा में आपस में बातचीत करने लगी तो मानव प्रजाति उसी भाषा में एक दूसरे से संप्रेषण का कार्य करने लगी। उदाहरण के लिए भारतवर्ष में अधिकतर आबादी हिंदी भाषा से परिचित है। और उसे बोलना भी जानती है तो भारत में रहने वाले परिवार, समाज आदि समूह के लोग हिंदी भाषा में संप्रेषण करेंगे अर्थात कहने का अर्थ है कि वह अपने विचार, संवेदना और भावनाओं को हिंदी माध्यम भाषा के माध्यम से दूसरे तक संप्रेषित करेंगे। संप्रेषण में दो या दो से अधिक व्यक्ति भी हो सकते हैं।

मानव को एक सामाजिक प्राणी कहा जाता है। अर्थात वह इस पृथ्वी पर विद्यमान हर एक जीव जंतु से घुल मिल जाता है। और उसे अपनी भाषा में बात करता है। हमारे संप्रेषण का स्वरूप अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग तरह का हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रेमिका से प्रेम कर रहा है तो उसके संप्रेषण का स्वरूप प्रेम भरा और रोमांचित करने वाला होगा। अगर कोई व्यक्ति व्यापार कर रहा है तो उसके संप्रेषण का स्वरूप व्यापारिक उद्देश्यों को प्राप्त करने वाला होगा।

अगर कोई व्यक्ति राजनेता होगा तो उसके संप्रेषण का स्वरूप अपनी राजनीतिक पहचान बनाने वाला होगा। ऐसी बहुत से उदाहरण है जो संप्रेषण की प्रक्रिया को और ज्यादा प्रभावित और समाज के लिए अति आवश्यक बनाते हैं। हमारा संप्रेषण जितना अच्छा होगा हम उतने अच्छे समाज में दिखेंगे उदाहरण के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लिए कहा जाता है कि वह एक बहुत अच्छे संप्रेषणकर्ता हैं। अर्थात वह अपनी बातों को भारतीय जनमानस तक बहुत ही स्पष्ट के साथ पहुंचने का प्रयास करते हैं।

सम्प्रेषण का मूल तत्व-

संप्रेषण का अर्थ यह नहीं है कि एक ही व्यक्ति बोलते रहे और दूसरा व्यक्ति सुनता रहे। संप्रेषण का अर्थ तब सफल होता है जब दोनों पक्षों से संप्रेषण की प्रक्रिया पूर्ण होती है। अर्थात हम किसी व्यक्ति से अपने भाव, विचार, इच्छाएं और संवेदनाएं आदि प्रकट करते हैं। और वह व्यक्ति हमारे संप्रेषण को समझ कर जब अपनी उस पर प्रतिक्रिया देता है। तब संप्रेषण पूर्ण होता है। अर्थात हम किसी व्यक्ति से कहें कि यार मेरे सर में बहुत तेज दर्द हो रहा है। वह व्यक्ति मेरे भाव को समझ कर जब उस पर प्रतिक्रिया स्वरूप कहे की तुम्हें इस समय आराम की जरूरत है साथ ही तुम्हें दवा भी खानी चाहिए तो यह एक स्वस्थ संप्रेषण माना जाएगा।

संप्रेषण के बिना कभी भी एक अच्छे समाज का निर्माण नहीं हो सकता। एक अच्छे समाज का निर्माण तभी हो सकता है जब उस समाज के लोग आपस में संप्रेषण करते हो।  अपने बात विचार को एक दूसरे से साझा करते हो और उस पर एक सार्थक निष्कर्ष निकालते हो।

निष्कर्ष- 

अतः हम कह सकते हैं कि संप्रेषण एक स्वस्थ समाज का निर्माण करता है जिससे एक स्वस्थ राष्ट्र का भी निर्माण होता है।

रचनात्मक लेखन में लिखित रूपhttps://bhojkhabar.com/%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a5%82/

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