समीक्षा, जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि

जिन दलित साहित्यकारों ने आत्मकथा लिखी उनमें सबसे महत्वपूर्ण तथा प्रसिद्ध ओमप्रकाश वाल्मीकि जी का “जूठन” है जो दो खंडों में प्रकाशित है। इस आत्मकथा में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने जीवन के भोगें सहे नग्न यथार्थ को और जातिवादी मानसिकता, वेदना को दिखाया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि का जूठन ‘1997’ में प्रकाशित हुआ है और यह आत्मकथा हिंदी साहित्य एवं दलित विमर्श की रचनाओं में मील का पत्थर कही जाती है यह सिर्फ एक आत्मकथा नहीं बल्कि दलित समुदाय के संघर्ष और पहचान की गाथा है ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भोगे हुए जीवन का यथार्थवादी चित्रण किया है।

जूठन की मूल संवेदना-

इस आत्मकथा में दलितों के जीवन की पीड़ा को दिखाया गया है और साथ ही यह भी दिखाया गया है कि उन्हें किस प्रकार उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है ? आजादी के बाद भी दलितों को जातिवाद और भेदभाव की दृष्टि से देखा जाता है उन्हें केवल उपयोगी वस्तु समझा जाता है। दलितों को छूने से ब्राह्मणवादी व्यवस्था या मानसिकता के लोग खुद को अपवित्र मानते थे। जाति का पता चलते ही उन्हें ‘चूहड़ा’ या चमार कहकर चिढ़ाते थे और गालियां देते थे ।

इस आत्मकथा में लेखक ने बचपन से लेकर जीवन के संघर्षों को,अपने अनुभवों को व्यक्त किया है। चूंकि यह एक आत्मकथा है इसलिए इसका मुख्य पात्र लेखक स्वयं होता है और पूरी घटना उसके स्वयं के जीवन में घटित होती है।

कहानी लेखक के आंखों से देखा गया घटनाक्रम है। लेखक बचपन से ही मेधावी छात्र रहा है उनकी रुचि पठन-पाठन में हमेशा से ही रही है। लेखक आठवीं कक्षा में पहुंचते पहुंचते शरतचंद्र , प्रेमचंद, रवींद्रनाथ टैगोर को पढ़ लिया था। इसी कारण से उनके पिता ने उनका नामांकन गांव की पाठशाला में करवा दिया लेकिन वहां भी उनके साथ जातिगत भेदभाव किया जाता है उन्हें स्वर्ण जाति के बच्चों के साथ बैठकर पढ़ने नहीं दिया जाता है।

उन्हें एकदम पीछे दरवाजे के पास बैठना पड़ता था जहां से बोर्ड पर लिखे अक्षर धुंधले दिखते थे। बच्चे उन्हें ‘चूहडें’ कहकर चिढ़ाते थे कभी-कभी बिना कारण पिटाई भी कर देते थे। उन्हें पानी पीने के लिए भी इंतजार करना पड़ता था, हैंडपप्प के पास खड़े रहकर किसी के आने का इंतजार करना पड़ता अगर कभी हैडपप्प को छू लिया तो उन पर तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे ताकि वह स्कूल छोड़कर भाग जाएं ।

एक दिन हेड मास्टर के आदेश पर स्कूल के मैदान में झाड़ू लगाना पड़ा था। काम नहीं करने पर उन्हें गाली सुनना पड़ता था जब कभी साफ- सुथरे कपड़े पहनकर कक्षा में जाते तो साथ के लड़के कहते हैं “अबे चूहड़े का,नए कपड़े पहन कर आया है।” मैले- पुराने कपड़े पहनकर स्कूल जाते तो कहते “अबे चूहड़े के’ दूर हट बदबू आ रही है।” अजीब हालात थे दोनों ही स्थितियों में अपमानित होना पड़ता था। लेकिन उन्होंने इन सभी संघर्षों के बावजूद भी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी अपनी शिक्षा तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए पूरी करते हैं।

“मुकुंदी ” वाल्मीकि की मां एक निम्न वर्ग की अशिक्षित महिला जो अपने परिवार के भरण पोषण के लिए खेतों में गेहूं काटने जाती थी।  तपती दोपहर में गेहूं काटना कठिन होता था इन सब मेहनत मजदूरी के साथ-साथ आठ-दस ‘तगाओ’ (हिंदू, मुसलमान) के घर तथा घेर (मर्दों का बैठकखाना तथा मवेशियों को बांधने की जगह) में साफ सफाई का काम करती थी।

इन सब कामों के बदलें मिलता था तो फसल के समय पांच सेर अनाज यानी लगभग ढाई किलो अनाज और इसके अलावा शादियों के समय टोकरी लिए दरवाज़ें के बाहर बैठती थीं ताकि बचे हुए जूठन मिल सकें । इस प्रकार कष्ट और यातानाओं को सहती हुई मुकुंदी अपने परिवार को एक साथ बनाए रखती है जो उसके कर्तव्य परायण स्त्री का बोध कराती है।

दूसरी ओर लेखक की भाभी जो अपना पाजेब लाकर मां के हाथ में रख देती है और कहती है “इसे बेच के लल्ला जी का दाखिला कर दो”भाभी का स्नेह था जो चाहती थी कि हम इस दलदल में भले दवे रहे लेकिन इन्हें इस दलदल से बाहर निकाले ताकि पढ़-लिखकर हमारी गरीबी मिटा सके। पिता का भी संघर्ष था जो अपने पुत्र को पढ़ने में हर संभव मदद करना चाहता है उनका मानना है कि पढ़ लिखकर हमें गरीबी से निजात दिलाएगा।

उनके पिता उनसे अधिक स्नेह करते थे क्योंकि वह पढ़ने में प्रतिभाशाली छात्र थे और घर में सबसे छोटे होने के कारण पिता से प्रेम सदैव मिलता था। इस प्रकार वाल्मीकि ने अपने पारिवारिक सहयोग से अपनी शिक्षा को पूर्ण किया।

इस आत्मकथा में लेखक ने स्वयं के जीवन को ही नहीं बल्कि पूरे दलित समुदाय की स्थिति का वर्णन किया है कि किस प्रकार उन पर आधिपत्य जमाया जाता था, उस समय समाज में अस्पृश्यता का ऐसा माहौल था कि कुत्ते-बिल्ली, गाय- भैंस को छूना बुरा नहीं था लेकिन यदि कोई दलित व्यक्ति का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था।

सामाजिक स्तर पर इन्हें इंसानी दर्जा नहीं था। वे सिर्फ जरूरत की वस्तु समझे जाते थे जिनके साथ अभद्र और पशुता जैसा व्यवहार किया जाता था। दलित साहित्य और विमर्श की दृष्टि से यह आत्मकथा एक मतत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह है कि किस प्रकार तात्कालिक समय में दलित एवं पिछड़े वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव और जातिवाद हो रहा है?

~दीनबंधु, बीए.आनर्स (हिन्दी), ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज  

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2 Comments

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  • Brijmohan kumar

    12 January 2026 / at 12:44 Reply

    Superb thinking 🤔 🤔

  • Munna

    23 January 2026 / at 10:58 Reply

    जिस तरह से आपने पत्रों का वर्णन किया वह दिलचस्प था खासकर भाभी का वाक्य सचमुच प्रभावित किया।।

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