साहित्य इतिहास का दर्शन

अगर हमें भारत का इतिहास जानना है तो हमारी पहली कड़ी होगी कि हम भारत के समाज के रूपरेखा उसके बनावट का इतिहास को जाने। तभी हम सुसंगठित और तथ्यों के साथ भारत का स्पष्ट इतिहास लिख सकते हैं। यही बात साहित्य पर भी लागू होता है क्योंकि किसी भी साहित्य के इतिहास का निर्माण उसे साहित्य में लिखने वाले लेखक ही करते हैं। अतः हम यह साहित्य के लेखक से उम्मीद कर सकते हैं कि उसको अपने साहित्य के इतिहास का ज्ञान होना अति आवश्यक है इसके लिए साहित्यकार को उस भाषा के साहित्य से संबंधित ग्रंथों का अध्ययन अति आवश्यक है।

इतिहास की पूर्वपीठिका-

वर्तमान दौर में समाज का साहित्य के प्रति अब वह लगाओ नहीं रहा जो आजादी से पूर्व था। क्योंकि आजादी के बिगुल को घर-घर पहुंचाने में साहित्य का अहम योगदान रहा। क्रांतिकारी पत्र, कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास आदि के माध्यम से अपनी वाणी को और अपने लेखन को साहित्य के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचाया। आज की भूमंडलीकरण के दौर में साहित्य के इतिहास दर्शन का अध्ययन इसलिए जरूरी हो जाता है कि आने वाली पीढ़ी एक गौरवपूर्ण साहित्यिक इतिहास के विरासत को भूल न जाए। इसलिए साहित्यिक इतिहास के लेखन की जरूरत अति आवश्यक हो जाता है।

वर्तमान स्थिति-

आज के वैश्वीकरण के दौर में पश्चिमी संस्कृतियों पूरी तरह हावी हो चुकी है। इसलिए अंग्रेजी भाषा का प्रचलन दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। जिससे कई मातृभाषाओं के विलुप्त होने का खतरा भी समाज के सामने आ खड़ा हुआ है। हर भाषा का अपना एक इतिहास होता है। उसकी एक ज्ञान परंपरा होती है। उसकी एक संस्कृति और एक सभ्यता होती है। अगर कोई भाषा विलुप्त होती है तो हम कह सकते हैं कि एक संस्कृति और सभ्यता का भी विलोपन हो जाता है।  अतः आज के इस भूमंडलीकरण के दौर में अपनी मातृभाषा संस्कृति और सभ्यता को बचाना अति आवश्यक जान पड़ता है।

यह तभी हम कर सकते हैं जब हमें अपने मातृभाषा के साहित्य, संस्कृति और सभ्यता का सुस्पष्ट ज्ञान हो और यह ज्ञान हमें उस भाषा के समाज और संस्कृति से प्राप्त होगा। इसके लिए यह अति आवश्यक हो जाता है कि हम उस भाषा के इतिहास और संस्कृति को समझे, पढे, लिखे और उसका अध्ययन करें क्योंकि हर भाषा का एक साहित्य होता है- जैसे हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, उड़िया साहित्य आदि।

किसी भाषा को उसका साहित्य तभी प्राप्त होता है जब उस भाषा में अधिक से अधिक लेखन कार्य, अधिक से अधिक ऐतिहासिक ग्रंथ, अधिक से अधिक रचनाएं लिखी गई हो। ऐसा नहीं है कि जिस भाषा का साहित्य कम लिखा गया है उसका कोई इतिहास नहीं है उसका भी इतिहास है लेकिन उसको भी एक नए सिरे से अध्ययन करने की प्रेरणा हमें साहित्य इतिहास दर्शन से ही प्राप्त होता है।

भारतीय समाज और साहित्य के इतिहास के मध्यकाल में भारतीय लोक भाषाओं का सृजनात्मक उत्थान हुआ। इस युग में लोक भाषाओं में कविताओं का लेखन और साहित्य आदि का लेखन हुआ। इसी लोक भाषा जागरण का परिणाम भारतीय साहित्य के इतिहास का भक्ति काल आंदोलन और उसका सृजनात्मक काव्य है।

यदि हम हिंदी साहित्य के संदर्भ में बात करें तो लोक भाषा के साहित्य या कविता का इतिहास हमें नाथ और सिद्धों के साहित्य में मिलता है जिन्होंने अपनी रचनाओं के लिए तत्कालीन लोक भाषा को चुना और उसी भाषा में अपनी रचनाओं को आम जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया। सिद्ध संप्रदाय के कवियों पर बौद्ध धर्म का सहज ज्ञान संप्रदाय का प्रभाव था इसलिए उनकी कविताओं में कहीं-कहीं पर ब्राह्मण धर्म और रूढ़ियां का विरोध भी मिलता है। 

भक्ति काल को हिंदी साहित्य के इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है ऐसा इसलिए कहा जाता है कि उसे कल के जितने भी भक्त कवि थे उन्होंने अपनी मातृभाषा में कविताएं लिखी और अपने ईश्वर की वंदना इस मातृभाषा में की जी मातृभाषा में वह पहले बड़े थे यह भक्ति काल की सबसे बड़ी उपलब्धि है। और इस बात की पुष्टि भक्ति काल के कई रहे तमिलनाडु के अडाल और असमिया साहित्य के कवि रहे शंकर देव की रचनाओं से पुष्ट होती है। वहीं विद्यापति ने मैथिली भाषा में पदावली की रचना।

भक्ति काल में भारत के सभी भाषाओं में रचनाएं भक्त कवियों द्वारा किए गए जिसमें कुछ कभी जैसे समाज सुधारक कवि लिखे जो अंत में गुड और सगुण के भेद को भूलकर अपनी रचनाओं को अपनी लोक भाषाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का सार्थक कार्य किया।

मध्यकाल में सरकारी कामकाज की भाषा फारसी थी और दूसरी महत्वपूर्ण भाषा संस्कृत थी इन दोनों भाषाओं से अलग हटकर हिंदी की लोक भाषण अपनी मातृभाषा में रचना और इस कार्य में सूफी कवियों ने भी कहां योगदान दिया अगर हम बात करें मुला दौड़ मलिक मोहम्मद जायसी नूर मोहम्मद आदि कवियों ने भी लोक भाषा में ही अपनी कविताओं की रचना की जिसे प्राय हिंदी ही कहा गया।

संस्कृत से हिंदी भाषा की उत्पत्ति हुई है लेकिन इस उत्पत्ति की प्रक्रिया में कई चरणों से गुजरते हुए वह हिंदी के रूप में हमें प्राप्त होती है जैसे पाली प्राकृतिक अपभ्रंश हिंदी तक का सफर और उसमें भी तमाम मातृभाषाएं जो अपने अस्तित्व के लिए अपने संस्कृति और सभ्यता के लिए संस्कृत जैसी प्रतिष्ठित भाषा से संघर्ष किया और खुद को स्थापित भी किया

हिंदी ने अपनी ही देश की भाषा संस्कृत से प्रतिस्पर्धा कर खुद को स्थापित किया संस्कृत के वर्चस्व को अपनी मातृभाषाओं से मुक्ति दिलाने में जिन कवियों ने अहम योगदान दिया उसमें से एक मराठी कवि संत ज्ञानेश्वर जी हैं जिन्होंने गीता का भगवत गीता का मराठी भाषा में अनुवाद किया और भगवान कृष्ण से अर्जुन के माध्यम से यह कहलाया की कि आप हमें अच्छा सिद्धांत को संस्कृत में ना बात कर मेरी मराठी भाषा में बताइए।

अपने समाज के इतिहास को जब हम हम तभी समझ सकते हैं जब हम अपनी समाज से पुरानी इतिहास को जाने उदाहरण के स्वरूप को स्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस लिखने से पहले बाल्मिकीकृत रामायण का अध्ययन किया और उससे भगवान राम की कथा का एक प्रारूप प्राप्त कर अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की अगर हम हिंदी की बात करें तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस से प्रेरणा प्राप्त कर हिंदी भाषा में आधुनिक स्वरूप में राम की शक्ति पूजा लिखकर एक नए राम की अवधारणा को स्थापित किया जो की पूरी तरह कलयुग के राम के रूप में एक आम मानव की तरह समाज में प्रस्तुत करते हैं। 

रोल भारत का मानना है कि एक रचनाकार को भाषा उसकी विरासत में मिलती है पर लेखन शैली उसकी अपनी होती है और यही लेखन शैली उसे रचनाकार को इतिहास में पहचान दिलाता है। इसको ऐसे समझे कि यदि हमने भारत में जन्म लिया है तो हमें हिंदी भाषा विरासत के रूप में मिली हुई है लेकिन हिंदी भाषा तो लगभग 70% आबादी भारत में बोलती है लेकिन इस भाषाई विरासत को प्राप्त कर हम तभी अलग हो सकते हैं जब हम इस भाषा का सुसंगठित प्रयोग कर कोई सामाजिक उपयोगी लेखन कार्य करें किसी ऐसे साहित्य की रचना करें जो सर्वश्रेष्ठ और समाज को एक नई दिशा देने वाली हो तब हमारी पहचान इतिहास में बनेगी। 

रोल भारत का यह अभी मानना है कि साहित्य की भाषा भाषा का राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व होता है।

संस्कृत से हिंदी भाषा की उत्पत्ति हुई है लेकिन इस उत्पत्ति की प्रक्रिया में कई चरणों से गुजरते हुए वह हिंदी के रूप में हमें प्राप्त होती है जैसे पाली प्राकृतिक अपभ्रंश हिंदी तक का सफर और उसमें भी तमाम मातृभाषाएं जो अपने अस्तित्व के लिए अपने संस्कृति और सभ्यता के लिए संस्कृत जैसी प्रतिष्ठित भाषा से संघर्ष किया और खुद को स्थापित भी किया

हिंदी ने अपनी ही देश की भाषा संस्कृत से प्रतिस्पर्धा कर खुद को स्थापित किया संस्कृत के वर्चस्व को अपनी मातृभाषाओं से मुक्ति दिलाने में जिन कवियों ने अहम योगदान दिया उसमें से एक मराठी कवि संत ज्ञानेश्वर जी हैं जिन्होंने गीता का भगवत गीता का मराठी भाषा में अनुवाद किया और भगवान कृष्ण से अर्जुन के माध्यम से यह कहलाया की कि आप हमें अच्छा सिद्धांत को संस्कृत में ना बात कर मेरी मराठी भाषा में बताइए।

अपने समाज के इतिहास को जब हम हम तभी समझ सकते हैं जब हम अपनी समाज से पुरानी इतिहास को जाने उदाहरण के स्वरूप को स्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस लिखने से पहले बाल्मिकीकृत रामायण का अध्ययन किया और उससे भगवान राम की कथा का एक प्रारूप प्राप्त कर अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की अगर हम हिंदी की बात करें तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस से प्रेरणा प्राप्त कर हिंदी भाषा में आधुनिक स्वरूप में राम की शक्ति पूजा लिखकर एक नए राम की अवधारणा को स्थापित किया जो की पूरी तरह कलयुग के राम के रूप में एक आम मानव की तरह समाज में प्रस्तुत करते हैं। 

रोल भारत का मानना है कि एक रचनाकार को भाषा उसकी विरासत में मिलती है पर लेखन शैली उसकी अपनी होती है और यही लेखन शैली उसे रचनाकार को इतिहास में पहचान दिलाता है। इसको ऐसे समझे कि यदि हमने भारत में जन्म लिया है तो हमें हिंदी भाषा विरासत के रूप में मिली हुई है लेकिन हिंदी भाषा तो लगभग 70% आबादी भारत में बोलती है लेकिन इस भाषाई विरासत को प्राप्त कर हम तभी अलग हो सकते हैं जब हम इस भाषा का सुसंगठित प्रयोग कर कोई सामाजिक उपयोगी लेखन कार्य करें किसी ऐसे साहित्य की रचना करें जो सर्वश्रेष्ठ और समाज को एक नई दिशा देने वाली हो तब हमारी पहचान इतिहास में बनेगी। 

रोल भारत का यह अभी मानना है कि साहित्य की भाषा भाषा का राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व होता है। साहित्य किसी राष्ट्र के पूर्व पेटिका पूर्व प्रीतिका और आने वाले भविष्य के साहित्य को भी लिखता है यदि हम बात करें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की तो साहित्यकारों ने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक नई जान फोकी जो पूरी तरह से अंग्रेजों से आजादी के लिए थी भारत का स्वाधीनता आंदोलन बहुत हद तक भारतीय साहित्यकारों ने भी अपने कलाम के माध्यम से चलाएं मान रखा बहुत से साहित्यकारों ने साहित्यकार के साथ-साथ क्रांतिकारी की भी भूमिका निभाई.

इसलिए साहित्य का इतिहास लेखन अति आवश्यक हो जाता है क्योंकि उसने देश की स्वाधीनता आंदोलन में भी अपने साहित्य के माध्यम से देश को स्वाभिमान तथा आत्मकथाओं के साथ पूर्ण स्वराज के साथ जीने का एक रास्ता भी दिखाया ऐसा नहीं की साहित्य सिर्फ भारत में ही आंदोलन का नेतृत्व किया है

यदि हम देखे तो जितने भी देश में गुलामी के प्रति आंदोलन हुआ उसमें कहीं ना कहीं वहां के बड़े बुद्धिजीवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से अपने देश को गुलामी से आजादी दिलाई रूसो वॉटर ऐसे तमाम बुद्धिजीवी हुए जिन्होंने अपने कालम और क्रांतिकारी विचार से अपने देश को आजाद दिलाए इसलिए साहित्य का इतिहास लेखक और उसके दर्शन का अध्ययन अति आवश्यक हो जाता है चाहे वह किसी भी भाषा का साहित्य क्यों ना हो।

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