हिंदी– भाषा और विकास

भाषा :–

            प्रकृति में पाए जाने वाले जीव,एक विशेष ध्वनि के माध्यम से आपस में वार्तालाप करते हैं जिससे वे अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करते हैं इसी अनुभूति का ध्वनि के रूप में व्यक्त होना ही भाषा कहलाती है।       

                       (भाषा:– सामान्य परिचय)

* वर्तमान की परिदृष्टि से विश्व में लगभग 6000 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं 

* भारोपीय परिवार के अन्य नाम–इंडो जर्मनिक, भारत–हिटी परिवार ,आर्य परिवार 

* ध्वनि के आधार पर भारोपीय परिवार की 10 भाषाएं हैं भारत में भाषा का प्राचीनतम रूप संस्कृत है भाषिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में विभाजित किया गया है–वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत 

प्राचीन आर्य भाषाएं :–

वैदिक भाषा:–  वैदिक संस्कृत को वैदिकी, वैदिक, छदस  छांदस, प्राचीन संस्कृति के नाम से भी जाना जाता है

*  वैदिक साहित्य के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु है जो निम्नलिखित है ।

संहिता–ऋक संहिता, यजु: संहिता, सम संहिता, अथर्व संहिता 

ब्राह्मण– इसमें कर्मकांड की व्याख्या की गई है।

उपनिषद– ब्राह्मण ग्रंथों का अंतिम भाग ।

 इसकी संख्या 108 है। इसमें 12 उपनिषद है 

* इसमें रक संहिता सबसे महत्वपूर्ण है

* इसी भाषा में वेद ,वेदांग तथा आरण्यक लिखे गए। वैदिक भाषा में कुल 52 ध्वनियों (13 स्वर, 39 व्यंजन) का प्रयोग होता था इस प्राचीन भाषा में तीन लिंग, तीन वचन और 8 कारकों का उल्लेख होता है । “डॉक्टर हरदेव बाहरी वैदिक स्वरों की संख्या 14 मानते हैं ।”

लौकिक भाषा :– वैदिक संस्कृत के तीन रूप देखने को मिलते है –पश्चिमोत्तरी ,मध्यवर्ती और पूर्वी ।‘लौकिक संस्कृत’ पश्चिमोत्तरी बोली पर आधारित थी इसी बोली को प्रमाणिक भी माना जाता था इस भाषा का प्राचीनतम ग्रंथ ‘रामायण’ माना जाता है जिसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि  है ।

* भाषा विकास में वैदिक संस्कृत के बाद की अवस्था लौकिक संस्कृत की है इस भाषा को संस्कृत या क्लासिक संस्कृत भी कहते हैं लौकिक भाषा का भाषिक विवेचन सर्वप्रथम पाणिनीकृत ‘अष्टाध्याई’ में मिलता है अष्टाध्याई इसी भाषा का व्याकरण रूप है ।

इसी भाषा मे रामायण,महाभारत ,अर्थशास्त्र ,नाट्यशास्त्र ,अभिज्ञान शाकुंतलम, कादंबरी ,आदि प्रसिद्ध रचनाएं लिखी गई।

मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषायें :–

* इसके अंतर्गत हम पाली, प्राकृत तथा अपभ्रंश का अध्ययन करते हैं ।

पाली :–प्रथम अवस्था

 पाली शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद है कुछ विद्वान ‘पल्ली’ से पाली शब्द की उत्पत्ति मानते हैं पल्ली का अर्थ है ‘ग्राम’ ।

 इस प्रकार  पाली का अर्थ होगा ‘ग्रामीण भाषा’।

विद्वान- “पाली को बौद्ध साहित्य को पालने वाली या रक्षा करने वाली भाषा मानते हैं” इसका प्रमाण इस प्रकार देते हैं –

“या रख्खतीती बुद्ध वचन इति पाली” अर्थात जिसमें बुद्ध के वचनों की रक्षा की गई वही पाली है। डॉक्टर हरदेव बाहरी के अनुसार- “भारत के अर्थ में ‘पाली’ शब्द का उपयोग सबसे पहले आचार्य बुद्ध घोष ने किया था।”

 * बौद्ध धर्म से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथ जो पाली में लिखे गए हैं ।

शुद्ध पिटक –बुद्ध के उपदेशों का संग्रह है

 विनय पिटक– संघ संचालन के लिए दी गई शिक्षाओं का संकलन है ।

अभिधम्म पीटक – धर्मों  का विषद और दार्शनिक विश्लेषण किया गया है ।

 पाली की ध्वनि संबंधी विशेषताएं:–

 कच्चायन के अनुसार पाली में 41 ध्वनियाँ है जिसमें 8 स्वर तथा 33 व्यंजन है  मैगलन के अनुसार पाली में ध्वनियों की संख्या 43 है, जिसमें 10 स्वर  व 33 व्यंजन है 

पाली की ब्याकरणिक संरचना :–

पाली में संस्कृत के नपुंसक लिंग व द्विवचन का लोप होने लगा ।अधिकतर व्यंजानात प्रतिपादित स्वरांत होने लगे इस प्रक्रिया में अंतिम हलंत व्यंजन हटने लगा या उसमें स्वर जोड़े जाने लगा जैसे जगत का जग ,राजन का राज,

 * पाली की शब्द की संपदा का मूल आधार स्वाभाविक रूप से तद्भव शब्द है।

प्राकृत:– दूसरी अवस्था

प्राकृत समय लगभग एक ई से 500 ई तक माना जाता है प्राकृत के विकास की अवस्थाओं को किशोरी दास बाजपेई आदि वैयाकरणों में तीन चरणों में बाटा है ।

प्रथम प्राकृत: ,द्वितीय प्राकृत:, तृतीय प्रकृत: ,सामान्य रूप से कहा जा सकता है ।

  •  प्राकृत की प्रथम अवस्था– पालि 
  • प्राकृत की द्वितीय अवस्था– प्राकृत
  • प्राकृत की तृतीय अवस्था– अपभ्रंश

प्राकृत की ध्वनि संबंधी विशेषताएं :–

प्राकृत की ध्वनि संरचना पालि  के समान ही है जो बातें पालि से अलग है वे इस प्रकार है–

 *विसर्ग के लुप्त होने की प्रक्रिया पालि में ही शुरू हो गई थी प्राकृति में इस संबंध में एक और विकास हुआ तथा विसर्गयुक्त अकारांत शब्द विसर्गहीन ओकारांत शब्दों में परिवर्तन होने लगे। जैसे –वीर: का  वीरो ,प्रश्न: का पन्हो

 * पाली में ‘य’ व्यंजन का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में होता था जबकि प्राकृत में प्राय: ‘य ’ समाप्त होने लगा और उसके स्थान पर ‘ज’ प्रयुक्त होने लगा जैसे – यश का जस , य: का जो ।

*आचार्य राजशेखर ने प्राकृत को मीठी तथा संस्कृति को कठोर कहा है ।

अपभ्रंश : तीसरी अवस्था:–

अपभ्रंश मध्यकालीन और आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी है भाषा के अर्थ में इसका प्रयोग छठी सती होने लगता है अपभ्रंश को अवहंस, ग्रामीण भाषा, देसी भाषा, आभीरोक्ति आदि नाम से भी जाना जाता है ‘वाक्यपदियम’ में भर्तीहरि ने बताया कि सर्वप्रथम ब्यादि ने संस्कृत के मानक शब्दों से भिन्न संस्कार च्युत,भ्रष्ट और अशुद्ध शब्दों को अपभ्रंश कहा है। ब्यादी का ग्रंथ ‘लक्षश्लोकात्मक संग्रह’ अनुपलब्ध है।

* प्रसिद्ध विद्वान डॉ उदय नारायण तिवारी और भोलानाथ तिवारी के अनुसार- “अपभ्रंश शब्द का भाषा के अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम चंद ने अपने ग्रंथ ‘प्राकृत लक्षण’ में किया है।”

* स्वयंभू ने अपभ्रंश को अपनी रामायण में अवहठ्थ कहा है 

* ग्रियर्सन, पीशेल ,भंडारकर चटर्जी ,बुलनर आदि विद्वानों ने अपभ्रंश को देश भाषा माना है जबकि कीथ याकोबि ज्यूलब्लाख,आदि विद्वानों ने अपभ्रंश को देशभाषा नहीं माना है।

* अपभ्रंश साहित्य का पहला संपादक डॉक्टर रिचर्ड पिशेल को माना जाता है।

* भाषा विद्वान डॉक्टर हरदेव बाहरी ने- “सातवीं सती से 11वीं सदी तक के समय को अपभ्रंश का स्वर्ण काल कहा है।”

* अपभ्रंश का सबसे बड़ा वैयाकरण हेमचंद्र को कहा जाता है ।

*पैसाची अपभ्रंस को केकेय भी कहा जाता है साहित्यिक अपभ्रंश को शुक्ल ने  पुरानी हिंदी कहा है।

अवहट्ट :–

भाषा का समय 900 ई से 1100 ई तक निश्चित किया गया है साहित्य में 14वीं सदी तक इसका प्रयोग होता रहा है

 * अवहट्ट भाषा अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के बीच की कड़ी मानी जाती है–सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार,।

*  ‘संदेश रासक’ में अवहट्ट  का उल्लेख मिलता है।

* अवहट्ट  के तीन भेद माने गए हैं पूर्वी ,मध्यवर्ती और पश्चिम ।

पुरानी या प्रारंभिक हिंदी :–

*चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने परवर्ती अपभ्रंश को ही पुराने हिंदी कहा है।

राजस्थानी हिंदी उपभाषा:–

*इस उपभाषा को लगभग 4 करोड लोग बोलते हैं इसमें पुलिंग एक वचन शब्द प्राय: ओकारांत  होते हैं यथा–हुक्को, तारों आदि।

* पुलिंग और स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन के अंत में ‘ऑ’ का प्रयोग किया जाता है जैसे  –तारा, रॉता आदि।

* राजस्थानी हिंदी  उप भाषा के अंतर्गत चार बोलियां आती हैं मारवाड़ी, जयपुरी ,मालवी व मेवाती।

मारवाड़ी :–

मारवाड़ी का विकास सौरसैनी अपभ्रंश के नागर रूप में हुआ है । 

* मीरा के पद कहीं ब्रजभाषा और कहीं मारवाड़ी में है 

* शुरू में मारवाड़ी की लिपि महाजनी थी किंतु बाद में यह देवनागरी में लिखी जाने लगी है।

जयपुरी :–

जयपुरी का विकास सौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से हुआ है यह पूर्वी राजस्थान के इलाकों में बोली जाती है तथा इसका केंद्र जयपुर है ।

जयपुर का पुराना नाम ढूंढाढ है, इस कारण से जयपुरी को ढूंढडी  भी कहते हैं ढूंढाड़ी शब्द ढूंढ शब्द से बना है जिसका अर्थ है टीला । इस इलाकों में तिलों की अधिकता है।

मालवी:–

मालवी दक्षिण राजस्थान की प्रतिनिधि बोली है लंबे समय तक उज्जैन के आसपास का क्षेत्र मालव या मालवा नाम से प्रसिद्ध रहा, इस कारण यहां की बोली को मालवी कहते हैं। * मालवी बोली का अधिकांश क्षेत्र मध्य प्रदेश में है किंतु इसकी भाषागत विशेषताओं के कारण इसे राजस्थानी में रखा गया है ।

*मालवी बोली को बुंदेली तथा मारवाड़ी के बीच का पुल का काम करता है ।

बिहार हिंदी: उपभाषा

ग्रियर्सन ने तीन बोलियो  को बिहारी हिंदी माना है– भोजपुरी, मगही और मैथिली । बिहारी हिंदी को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है– पूर्वी बिहारी, व पश्चिम बिहारी

* मैथिली व मगही पूर्वी बिहारी की जबकि भोजपुरी पश्चिम की बोली है।

भोजपुरी :–

भोजपुरी का बोली के अर्थ में सर्वप्रथम प्रयोग 1789 ईस्वी में काशी के राजा चैत सिंह के सिपाहियों की बोली के लिए हुआ। 

* भोजपुर के ही नाम पर इस बोली का नाम भोजपुरी पड़ा। * लोक प्रचलन की दृष्टि से यह हिंदी की सबसे बड़ी बोली है * भारत के बाहर भी मॉरीशस, फिजी आदि देशों में यह अत्यधिक प्रचलित है । भिखारी ठाकुर भोजपुरी के सबसे प्रसिद्ध लोक कवि और नाटककार हैं इन्होंने विदेशिया सहित 12 नाटकों की रचना की है इन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है महेंद्र मिसिर भोजपुरी लोक साहित्य का अन्य बड़ा नाम है इसके पूर्वी लोकगीत, विवाह के विदाई गीत तथा मुजरे अत्यंत लोकप्रिय है ।

पूर्वी हिंदी :उपभाषा

पूर्वी हिंदी का क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ तक फैला हुआ है प्राचीन समय में जिस क्षेत्र को उत्तरी कौशल तथा दक्षिणी कौशल कहा जाता है, वहीं क्षेत्र पूर्वी हिंदी का क्षेत्र है।

* पूर्वी हिंदी के अंतर्गत तीन बोलियों आती हैं– अवधि ,बघेली और छत्तीसगढ़ी ।

अवधि :–

मध्य देशीय अवहट्ट से अवधि का उदय माना जाता है इस बोली के लिए  ‘कोसली’ बैसवादी शब्दों का प्रयोग भी होता है कौशल अवध का पुराना नाम है अतः वहां की बोली कोसली  कहलाई ।

* अवध के क्षेत्र में बैस राजपूत का वर्चस्व था और उसकी बोली बैसवादी कहलाई ।

* पंडित दामोदर शर्मा कृत ‘उक्तिव्यक्ति प्रकरण’ में यह कोसली के रूप में मिलती है।

* कुवलयमाला कहा में उदयातन सूरी ने कोसली  का प्रयोग देसी भाषा के रूप में किया है।

* तुलसी ने अवधि को गांव की भाषा कहा है । 

“गिराग्राम्य” में सियराम यस,गांवही सुनाही  सूजान” ।

पश्चिमी हिंदी :उपभाषा :–

* ‘पश्चिमी हिंदी’ हिंदी भाषा का सबसे ज्यादा बड़ी उपवर्ग है जिसका विस्तार क्षेत्र अंबाला से कानपुर तक तथा देहरादून से महाराष्ट्र के आरंभ तक विकसित है और फैला हुआ है।

ब्रजभाषा:–

ब्रजभाषा का अर्थ– पशुओं या गायों का समूह या चारागाह पशुपालन की अधिकता के कारण यह क्षेत्र ब्रज कहलाया और इसकी बोली ब्रज भाषा ।

* इस भाषा का प्रारम्भिक स्वरूप आदिकालीन साहित्य में पिंगल तथा मध्यकाल में भाखा नाम से मिलता है।

*  1354 ईस्वी में सुधीर अग्रवाल द्वारा रचित पद्मिनी चरित्र ब्रजभाषा की प्राचीनतम ज्ञात कृति मानी जाती है । हेमचंद्र के ‘प्राकृत व्याकरण’ में सुर सैनी अपभ्रंश के दोहों में ब्रजभाषा का  पूर्व  रूप मिलता है ।

*संक्रमण कालीन रचनाओं जैसे ‘संदेश रासक’ तथा ‘प्राकृतिक पैगलम ’आदि में पुरानी ब्रजभाषा मिलती है

खड़ी बोली:–

सुनीति कुमार चटर्जी ने खड़ी बोली को मर्दानी भाषा तथा जनपति हिंदुस्तानी कहा है ।

* ग्रियर्सन  ने खड़ी बोली को देसी हिंदुस्तानी अथवा वर्नाकुलर हिंदुस्तान की संज्ञा दी है ।

* बिम्स ,सुनीति कुमार चटर्जी, धीरेंद्र वर्मा आदि भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार खड़ी बोली का आधार कोरवी  है ।

* खड़ी बोली मानक हिंदी का आधार कॉल बुक ने कन्नौजी को माना,  एस्ताविक तथा मोहम्मद हुसैन ने ब्रजभाषा को माना और  मसूद हसन खान ने हरियाणवी को माना है ।

* हिन्दी साहित्य के प्रख्यात विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मताअनुसार :– “अपभ्रंश नाम पहले पहल बालभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों भाषा का कवि कहा है।”

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