
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911-1987) का निबंध ‘रूढ़ि और मौलिकता’, जो उनके संग्रह ‘आत्मनेपद’(1) में संकलित है, केवल कला और साहित्य पर एक चिंतन-मनन नहीं है, बल्कि यह उस युग की वैचारिक भूमि को स्पष्ट करता है जिसने हिन्दी साहित्य में ‘प्रयोगवाद’ और ‘नई कविता’ जैसे आंदोलनों को जन्म दिया। इस निबंध को मात्र एक वैचारिक लेख कहना पर्याप्त नहीं होगा; यह प्रयोगवाद की रचनात्मकता और आधुनिकता की कसौटी को स्थापित करने वाला एक सशक्त, तार्किक और बौद्धिक घोषणा-पत्र है। यह निबंध रूढ़ि और मौलिकता के प्रचलित सतही अर्थों को चुनौती देता है, बहरहाल प्रयोगवादी तो कबीर को भी खा जा सकता है। जिस प्रकार से अज्ञेय ने जड़ रूढ़ियों (परम्परा) को नकारा और उनके स्थान पर चलायमान और प्रयोगात्मक रूढ़ियों (परम्परा) को स्थापित किया। उसी प्रकार से कबीर अपने ईश्वर की वंदना करते हुए कहते हैं :-
“दिन दहुँ चहुँ के कारणै, जैसे सैबल फूले।
झूठी सूँ प्रीति लगाई करि, साँचे कूँ भूले।” (2)
कबीर यहाँ पूर्व पुष्प उपमानों जैसे कमल, चम्पा, कदंब आदि को छोड़ कर एक जंगली फूल सैमल (सैबल) का उदाहरण दे रहे हैं, जोकि अपने समय की जड़ रूढ़ि से मुक्त हो कर एक नवीन प्रयोग करना है। जिसे अपने युगानुरूप ढाल कर अज्ञेय ने आगे प्रसारित किया और सृजनशीलता के लिए एक नए दार्शनिक आधार की स्थापना की।
निबंध का आरम्भ ही समकालीन साहित्यिक आलोचना के फैशन से होता है। अज्ञेय कहते हैं, “आलोचना के वर्तमान फैशन की ओर तनिक ध्यान दे तो देखेंगे, आजकल हिंदी में (हिंदी में ही क्या प्रायः सर्वत्र ही,) लेखक अथवा कवि की रचनाओं के ‘मौलिक’, ‘व्यक्तिगत’ विशेष गुणों पर ज़ोर देने की परिपाटी-सी चल पड़ी है। आजकल का साहित्यकार अपनी ‘भिन्नता’ के लिए प्रशंसा पाता है। ‘मौलिकता’ ‘भिन्नता’ का ही पर्यायवाची बन गया है।” (3) मौलिकता में यह देखना चाहिए कि लेखक की स्वयं की उपज क्या है? और मौलिकता परंपरा के समावेश से ही अर्जित की जा सकती है। भिन्नता से इसकी तुलना नही की जा सकती। निर्मल वर्मा कहते हैं, “जो कुछ भी साहित्य में एक बार जीवन्त रूप में रहा है, वह साहित्य में कभी नही मरता”(4) निर्मल भी यहाँ परंपरा के विषय में ही कह रहे हैं। यदि कोई परंपरा साहित्य में जीवन्त है तो वह कभी पूरी तरह से मर नही सकती और न ही मारी जा सकती है। आने वाले साहित्यकार उस परंपरा से कुछ न कुछ अवश्य ही लेंगे और खुद का कुछ मौलिक उपजाएंगे।
अज्ञेय उस परिपाटी पर तीखा व्यंग्य करते हैं जहाँ रूढ़ियों को ‘जीवन-नाटक के खल-नायक’ के पद पर बिठाकर उनका तिरस्कार किया जाता है। वे देखते हैं कि लेखक की ‘आधुनिकता’ का मूल्यांकन इसी कसौटी पर किया जाता है कि वह ‘किस हद तक रूढ़ियों को मानता अथवा तोड़ता है’। अज्ञेय इस एकांगी दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हैं।
उनके लिए, रूढ़ि का अर्थ जड़ता, अंधानुकरण या पुरानी परिपाटियों की नकल नहीं है। वे रूढ़ि को इलियट (T. S. Eliot) की तरह ‘ऐतिहासिक चेतना’ से जोड़ते हैं। अज्ञेय कहते हैं, “आधुनिक हिंदी लेखक में यदि यह ऐतिहासिक चेतना होगी तो उसकी रचना में न केवल अपने युग, अपनी पीढ़ी से उसका सम्बन्ध बोल रहा होगा; बल्कि उससे पहले की अनगिनत पीढ़ियों की और साथ ही अपनी पीढ़ी की संलग्नता और एकसूत्रता की भी तीव्र अनुभूति स्पंदित हो रही होगी।” (5) यह चेतना अतीत की मात्र ‘बीतेपन’ की नहीं, बल्कि उसकी ‘वर्तमानता’ की भी तीखी और चिर-जाग्रत अनुभूति है। परंपरा वह वस्तु नहीं है जिसे बाहर से ग्रहण किया जाए, बल्कि यह वह है जिसे लेखक अपनी साधना से आत्मसात् करता है। अज्ञेय कहते हैं, “रूढ़ि अथवा परंपरा कोई बनाई चीज़ नही है, जिसे साहित्यकार ज्यों का त्यों पा या छोड़ सकता है।…परम्परा स्वयं लेखक पर हावी नही होती, बल्कि लेखक चाहे तो परिश्रम से उसे प्राप्त कर सकता है।” (6)
इस प्रकार, अज्ञेय रूढ़ि को नकारने के बजाय, उसे सृजन का अनिवार्य आधार बनाकर प्रयोगवाद के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्रयोगवाद का अर्थ परंपरा से विच्छेद नहीं, बल्कि उसे समसामयिक बनाने की साधना है।
यदि रूढ़ि आधार है, तो मौलिकता उस आधार पर रचनात्मकता का शीर्ष है। अज्ञेय ‘मौलिकता’ को ‘भिन्नता’ का पर्यायवाची मानने के फैशन का विरोध करते हैं। वे मानते हैं कि लेखक की प्रशंसा उसकी ‘भिन्नता’ के लिए हो रही है, जबकि सच्ची मौलिकता का स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है। अज्ञेय का मौलिकता-सिद्धांत सृजन की रासायनिक क्रिया पर आधारित है। वे कहते हैं कि नूतनता लाने के लिए कवि को ‘नूतन अनुभव खोजने की आवश्यकता नहीं है’, क्योंकि ऐसी खोजें उसे ‘मानवीय वासनाओं के विकृत रूपों की ओर ही ले जाएँगी’। यह एक गंभीर चेतावनी है जो प्रयोगवाद को विकृतिवाद या सनक से अलग करती है।
सच्ची मौलिकता का सार ‘प्रयोगधर्मी’ होने में है। प्रयोगधर्मी होने का तात्पर्य अपने आप को अत्याधुनिकता से लैस दिखाना और पूर्ववर्तियों को जड़ और जटिल दिखाने से नही है। अज्ञेय कहते हैं, “आधुनिक लेखक की आलोचना पूर्ववर्तियों जैसा या पूर्ववर्तियों से अच्छा या बुरा कह कर नही की जा सकती। न ही आधुनिक साहित्य का मोल पूर्ववर्ती आलोचकों की कसौटियों पर आंका जा सकता है।” (7)
पुराने या नये साहित्यकार में कोई तुलना नही है। वे दौनो अपने युग का प्रतिबिम्ब लिखते हैं, वे नए अनुभवों की, नए भावों की खोज नहीं करते, अपितु पुराने और परिचित भावों के उपकरण से ही ऐसी नूतन अनुभूतियों की सृष्टि करते हैं जो उन भावों से पहले प्राप्त नहीं की जा चुकी हैं। यह सिद्धांत प्रयोगवादी कवियों को यह वैचारिक बल देता है कि वे कविता में नए प्रतीकों, बिम्बों और शिल्प का प्रयोग करते हुए भी, मूलतः मनुष्य की चिर-परिचित अनुभूतियों जैसे प्रेम, दुःख, विरह, मृत्यु आदि को ही एक नया अर्थ-संदर्भ दे रहे हैं।
‘रूढ़ि और मौलिकता’ की सबसे बड़ी साहित्यिक सार्थकता टी. एस. इलियट के ‘परंपरा और वैयक्तिक प्रतिभा’ (Tradition and the Individual Talent) निबंध से लिए गए सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ में लागू करने में है। अज्ञेय इलियट के दो केंद्रीय विचारों को उद्धृत करते हैं:
अज्ञेय इस सिद्धांत को ‘काव्य की निर्वैयक्तिक परिभाषा’ का नाम देते हैं। वे कवि के मन की तुलना ‘प्लेटिनम चूर्ण’ से करते हैं, जो रासायनिक क्रिया में सहायक होता है, लेकिन स्वयं निष्क्रिय रहता है। कविता का गौरव उसमें वर्णित विषय की श्रेष्ठता में नहीं, बल्कि ‘रसायनिक क्रिया की तीव्रता’ में है।
वे इलियट के ‘व्यक्तित्व से मुक्ति’ के विषय में भी चर्चा करते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, ‘काव्य में कवि का व्यक्तिगत ‘व्यक्तित्व’ नहीं, बल्कि ‘वह माध्यम प्रकाशित होता है, जिसमें विभिन्न अनुभूतियाँ और भावनाएँ चमत्कारिक योग में युक्त होती हैं’।” (8) इस निर्वैयक्तिक सिद्धांत के माध्यम से अज्ञेय प्रयोगवादी कविता के आत्म-सजग शिल्प और वस्तुनिष्ठ अभिव्यक्ति को दार्शनिक वैधता प्रदान करते हैं। यह उन्हें छायावाद की व्यक्तिपरक भावुकता से अलग करता है और उन्हें एक ऐसा रास्ता दिखाता है जहाँ रचयिता का महत्त्व रचना करने की क्रिया की तीव्रता में है, न कि अपने अहं की अभिव्यक्ति में।
‘रूढ़ि और मौलिकता’ निबंध हिन्दी के वैचारिक गद्य के लिए एक मानक स्थापित करता है।
‘रूढ़ि और मौलिकता’ निबंध हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद का मात्र एक विश्लेषण नहीं, बल्कि उसका सैद्धांतिक घोषणा-पत्र है। यह निबंध प्रयोगवादी कवि को यह स्पष्ट करता है कि उसकी मौलिकता ‘नूतन अनुभव’ खोजने में नहीं, बल्कि ‘नया योग ढालने’ में है। यह उन्हें बताता है कि विद्रोह रूढ़ि को तोड़कर नहीं, बल्कि उसे आत्मसात् करके और अपने व्यक्तित्व का आत्मदान करके संभव है। अज्ञेय ने इस निबंध के माध्यम से इलियट के विचार को भारतीय चेतना में प्रत्यारोपित किया और हिन्दी आलोचना को एक सुदृढ़ दार्शनिक आधार दिया। यह निबंध आज भी साहित्यकार के सृजन के उत्तरदायित्व, कला की निर्वैयक्तिकता और परंपरा की जीवंतता को समझने के लिए एक अनिवार्य पाठ बना हुआ है।
अज्ञेय जिस परम्परा पर चलने की बात कह रहे हैं उस पर सभी लेखकों को चलना चाहिए, प्रोत्साहित करने के लिए अज्ञेय कहते हैं :-
बीहड़ में अकेले भी निश्चिंत रहो,
स्थिर जानो!
अरे यह तो सीधी क्या एक मात्र राह है। (9)
सन्दर्भ सूची :-
मुकुल शर्मा
स्नातक (विशेष) हिन्दी, चतुर्थ वर्ष
आत्मा राम सनातन धर्म महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
दुनिया का सबसे अनमोल रत्न ~प्रेमचंद…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%a8/
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soni
बहुत अच्छे से विचारशील लेखक लिखा है।
अमन
सारगर्भित लेख
प्रीति संभव
अज्ञेय के निबंधों को देखने का नया प्रतिमान है यह