झूठा सच उपन्यास यशपाल द्वारा रचित है। यह उपन्यास दो खण्डों में विभक्त है। वतन और देश(1958) तथा देश का भविष्य(1960)। यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी का चित्रण करने के साथ-साथ मानवीय जीवन की त्रासदी का चित्रण भी करता है। इस उपन्यास में मुख्य पात्र तारा, जयदेव पुरी और कनक हैं।
इस उपन्यास में विभाजन से पूर्व मध्ययुगीन जीवन, वहाँ के जनसमाज का मानसिक गठन, राजनीतिज्ञों के दाँव-पेंच, सांप्रदायिक स्वार्थों के कारण हिंदू-मुसलमान के बीच बढ़ती खाई, देश का विभाजन, सांप्रदायिक दंगे, लूट-खसोट, रक्तपात, लाखों व्यक्तियों का विस्थापित होना, उनकी जिजीविषा और संघर्ष, कांग्रेस का शासन, स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद का सामाजिक जीवन, विविध क्षेत्रों में चलने वाली धांधली, उच्च वर्ग की स्वार्थपरता, मध्यवर्ग की कुण्ठा, निम्नवर्ग की निराशा, जनता की जागरूकता आदि यह सब कुछ ‘झूठा सच’ में साकार हो गया है।
झूठा सच उपन्यास के मूल तत्त्व-
पहले खंड में विभाजन से पहले की स्थिति का चित्रण किया गया है और दूसरे खंड में विभाजन के बाद का चित्रण मिलता है। उपन्यास की शुरुआत लाहौर से होते हुए दिल्ली और जालंधर तक का वर्णन मिलता है। जिसमें पुरी मध्यवर्ग का प्रतिनिधि पात्र है, जो अपनी सारी कमजोरियों के साथ उपन्यास में मौजूद है। विभाजन से पहले वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद पत्रकारिता के जरिए राजनेताओं द्वारा फैलाए जा रहे द्वेष को देश के आम जनता के सामने उजागर करता है।
अंततः अपने सिद्धांतों के कारण नौकरी से निकाल दिया जाता है। वह एक प्रगतिशील, समझदार और धार्मिक सद्भाव में विश्वास रखने वाला पात्र है। वही उपन्यास के दूसरे भाग में जब वह राजनेता बनता है तो स्वयं भी वही करता है जिसका वह पहले विरोध करता था।
कथा का प्रारंभ लाहौर के मध्यवर्गीय परिवार, मध्यवर्गीय समाज को उसकी संकीर्णता में ग्रहण किया गया है। यह मध्यवर्गीय परिवार रामलुभाया का है। मास्टर रामलुभाया ट्यूशन पढ़ाके अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। उसकी दोनों संतानें जयदेव पुरी और तारा विद्यार्थी जीवन जी रहे है, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण पुरी को जेल हो जाती है।
जेल से मुक्त होकर वह आर्थिक कठिनाई का सामना करने के लिए उर्मिला को ट्यूशन पढ़ाता है। परंतु उर्मिला के स्वभाव के कारण वह ट्यूशन छोड़कर लाहौर में ही पं. गिरधारी लाल की पुत्री कनक को पढ़ाने लगता है। धीरे-धीरे कनक और पुरी के बीच की आत्मीयता प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। तारा भी युवा होने के कारण कामरेड असद से अपना वैवाहिक संबंध स्थापित करना चाहती है।
पुरी की बहन तारा मध्यवर्गीय लेकिन प्रगतिशील सोच रखने वाली एक आम लड़की है जिसने देश के बंटवारे को एक नागरिक के रूप में कम और एक स्त्री के रूप में ज्यादा झेला है। लेकिन उसे घर वालों के सम्मुख पराजित होकर अशिक्षित सोमराज से अनमेल विवाह करना पड़ता है। सुहागरात को ही सोमराज उसके साथ पाश्विक व्यवहार करता है। उसी रात मुसलमानों के द्वारा आग लगाए जाने पर तारा उसी शोर में सोमराज से पीछा छुड़ा कर भाग जाती है। उसी रात लाहौर में हिंदू मुस्लिम दंगे भी हो रहे थे।
उन दंगों में तारा के साथ नब्बू द्वारा बलात्कार किया जाता है। उसके बाद स्त्रियों का क्रय विक्रय करने वाले मुसलमान गुंडे गफूर के हाथों में तारा पहुंच जाती है। किसी भी परिस्थिति में इन हालातों को स्वीकार नहीं किया जा सकता और ना ही कोई भी माफ़ी तारा के घाव भरने में पर्याप्त सिद्ध हो सकती है। फिर पुलिस द्वारा तारा को वहां से शरणार्थी कैंप में पहुंचाया जाता है। वहां कमेटी की सदस्यता कौशल्या देवी के साथ अपने वतन और देश अमृतसर पहुंच जाती है।
कनक भी तारा की तरह एक प्रगतिशील और नई सोच रखने वाली लेकिन एक संपन्न परिवार की लड़की है, जहाँ उसे उसके फैसले लेने में इतनी समस्या नहीं होती, जितनी तारा को। कनक के परिवार को भी विभाजन के समय लाहौर में अपने घर को छोड़कर दिल्ली आकर बसना पड़ता है। कनक पुरी के साथ प्रेम करती है लेकिन वह पुरी के अवसरवादी और छल पूर्ण व्यवहार को अस्वीकार करने की हिम्मत भी रखती है। कनक और पुरी के संबंध में यशपाल ने अपनी स्त्री संबंधित सोच को व्यक्त किया है।
जिसमें यशपाल स्त्रियों के सारे फैसले स्त्रियों को लेने देने के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। दूसरी ओर पुरी और कनक का प्रेम बढ़ता चला जाता है। कनक द्वारा नौकरी के आश्वासन दिए जाने पर पुरी नैनीताल चला जाता है, परंतु लाहौर में दंगों की खबर सुनकर वह लाहौर वापस आ जाता है, जहां उसके घरवाले नहीं मिलते। वह अपने घर वालों को ढूंढने निकल पड़ता है और कथा अंत हो जाता है।
इसी प्रकार से उपन्यास अपनी प्रगतिशीलता को कायम करते हुए आगे बढ़ता है। यहां तक कि उन्होंने यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि गुलाम भारत में जिस प्रकार भारत अंग्रेजों के अधीन था उसी प्रकार से आजाद भारत में विभाजन के बाद भारत कांग्रेस पार्टी के अधीन है।
दूसरे खंड ‘देश का भविष्य’ में आजादी के बाद की स्थितियाँ हैं जिसमें एक ओर कुछ बुद्धिजीवियों व नेताओं की प्रगतिशील भूमिका का चित्रण है तो दूसरी ओर सूद और सोमराज जैसे उन तत्त्वों की भी चर्चा है जो राजनीति और पत्रकारिता को शुद्ध व्यवसाय बनाकर भ्रष्टाचार व बेईमानी के माध्यम से समाज को लूटने में लगे हैं। जिसके प्रतिनिधि पात्र के रूप में उन्होंने सूद जी नामक पात्र को लाए हैं।
सूद जी एक कांग्रेसी नेता हैं जो पुरी को भारत आने पर काफी मदद करते हैं। उन्हें जालंधर के विधानसभा के सीट से चुनाव लड़ने का मौका भी मिलता है और वह जीत भी जाते थे। विधायक बनने के बाद फिर आगे चल कर मंत्री भी बनते हैं लेकिन लोकतंत्र में जब जनता में जागरुकता पैदा हो जाती है तो एक बार लोकतंत्र के महापर्व में वह अपने क्रूर रवैये के कारण अपने ही सीट से चुनाव हार जाते हैं।
इनकी तुलना तारा, डॉ. नाथ, श्यामा, पत्रकार कनक तथा इंजीनियर नरोत्तम जैसे चरित्र भी हैं जो देश की आजादी का सम्मान करते हुए अपने दायित्वों के निर्वहन में ईमानदारी से जुड़े हैं। शिक्षित और सुंदर तारा भी मिस्टर रावत, सेक्रटरी, होम मिनिस्टर से मिलकर तथा डॉ. प्राणनाथ का सहयोग पाकर अंडर सेक्रटरी फॉर स्माल स्केल इंडस्ट्रीज वीमन सेक्शन का पद प्राप्त कर लेती है। यहां उसका प्रेम डॉ. प्राणनाथ से हो जाता है, और वह उससे विवाह कर लेती है दूसरी ओर तारा का पक्ष लेने पर कनक और पुरी में तनाव बढ़ने लगा जो निरंतर बढ़ते ही चला गया।
अंततः पुरी ने उसे तलाक के नोटिस दे दिया। परंतु चुनाव में सूद के जीतने और मिनिस्टर बन जाने पर पुरी और सोमराज ने तारा और प्राणनाथ को नोटिस भिजवा कर केस सूद के माध्यम से प्रधानमंत्री तक पहुंचा दिया। इससे तारा ने नौकरी से त्यागपत्र देने का मन बना लिया। अगले चुनाव में मिस्टर सूद पराजित हो जाते हैं और वह त्यागपत्र नहीं देती।
इस प्रकार यशपाल झूठा सच दोनों भागों में 1942 से 1957 तक की घटनाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समेटे हुए है। प्रथम भाग में हिंदू-मुस्लिम दंगों, खून-खराबे, अत्याचार, मारधाड़ का चित्रण स्वाभाविक धरातल पर किया गया है। दूसरे भाग में बदलती मान्यताएं, बदलते मूल्यों के अतिरिक्त विस्थापितों का पाकिस्तान के काफिलों में आना, रेल में भीड़भाड़, कैंपों में लोगों की समस्याएं, नैतिक मान्यताएं, अराजकता का वातावरण के यथार्थ चित्र मिलते हैं। यशपाल ने देश विभाजन के पीछे की राजनीति का पर्दाफाश किया है तथा सत्ता प्राप्ति के लिए अपनाए गए हाथकड़ों को उजागर किया है।
~विशाल, परास्नातक हिन्दी विभाग ( दिल्ली विश्वविद्यालय )
‘कोहबर की शर्त ‘की समीक्षा…https://bhojkhabar.com/1%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8/
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