गैंग्रीन ~सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

पात्र- मालती ( महेश्वर की पत्नी ), महेश्वर ( डॉक्टर जो गैंग्रीन का इलाज करता है और मालती का पति )  टिटी( मालती और महेश्वर का बेटा ) और लेखक 

गैंग्रीन कहानी श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की सर्वप्र्सिद्ध कहानी है। यह कहानी सर्वप्रथम 1937 में ‘विपथगा’ में ‘रोज’ नाम से प्रकाशित हुआ। लेकिन 1990 के संस्करण में ‘रोज’ कहानी ही ‘गैंग्रीन’ के नाम से प्रकाशित हुई।

कहानी के मूल तत्व-

गैंग्रीन एक बीमारी है। इसी बीमारी का इलाज मालती के पति महेश्वर करते थे। हो सकता हो इसी कारण इस कहानी का नाम ‘रोज’ से बदलकर ‘गैंग्रीन’ रख दिया गया हो। इस कहानी को हिंदी साहित्य में सबसे अधिक प्रसिद्ध रोज नाम से मिला। क्योंकि रोज शीर्षक इस कहानी के मर्म को बखूबी प्रस्तुत करता है।

इस कहानी के माध्यम से लेखक ने वैवाहिक जीवन में नारी के यांत्रिक जीवन को दिखाया है। कैसे शादी से पहले वहीं महिला एक चंचल, हसते और खेलते स्वभाव की लड़की रहती। है लेकिन शादी के बाद उसके स्वभाव में परिवर्तन आता है। और अपनी सारी चंचलता को छोड़कर घर की कामों में लग जाती है सारा काम खुद करती है। इस कार्य को रोज-रोज करती है। लेखक ने इसी बात को इस कहानी में रेखांकित किया है। कि कैसे वैवाहिक जीवन में एक स्त्री या पुरुष मशीन की भांति कार्य करने लगते हैं। 

अगर हम रोज कहानी की बात करें तो तो रोज कहानी में एकल परिवार के घटनाओं को कहानी के माध्यम से दिखाया गया है। कैसे एक स्त्री अपनी एक जैसी दिनचर्या को प्रतिदिन निभाती है। क्योंकि मालती का पति महेश्वर एक डॉक्टर है जो एक सरकारी आवास में रहते हैं। महेश्वर सुबह 7:00 बजे अस्पताल चला जाता है और दोपहर में डेढ़ या दो बजे घर आता है। पुनः भोजन वगैरह करने के बाद शाम में अस्पताल जाता है रोगियों को देखने के लिए। 

जब मालती का पति महेश्वर अस्पताल चला जाता है तो मालती अपने सारे कामों को जो प्रतिदिन एक मशीन की भांति रहती है उसको वैसे ही प्रतिदिन करती रहती है। अगर हम मालती के दिनचर्या की बात करें तो वह अपने पति से पहले सुबह उठाती घर की साफ सफाई, नाश्ता, खाना और अपने बच्चों की देखभाल करना और समय से पति और बच्चों को भोजन कराना। उनका घर आने का इंतजार करना और यही कार्य प्रतिदिन करती है।

लेखक ने इस कहानी के माध्यम से शादी के बाद स्त्री के जीवन के मशीनीकरण को दिखाया गया है। कैसे एक महिला एक मशीन की भांति प्रतिदिन इस कार्य में लगी रहती है। जब लेखक एक दिन मालती के घर जाता है। और मालती के दिनचर्या को देखाता है तथा दिन-रात बच्चे और पति के सेवा में मालती का पूरा दिन गुजर जाता है। तो लेखक बहुत आश्चर्यचकित होता है।

क्योंकि लेखक मालती का बचपन का दोस्त होता है और वह मालती के स्वभाव से बखूबी परिचय था कि कैसे मालती बचपन में खेलती कूदती हंसी मजाक करने वाली लड़की आज एक चार दिवारी में बंद हो कर सारे कार्यों में व्यस्त है। तो इसलिए इस कहानी का पहला शीर्षक जो रोज था वह अति उपयुक्त था इस कहानी के मर्म को प्रस्तुत करने के लिए। लेकिन बाद में 1990 में यह कहानी गैंग्रीन नाम से प्रकाशित हुई।

इस कहानी के माध्यम से लेखक ने एकल परिवार की कमियों को भी रेखा अंकित किया है। कैसे एकल परिवार में एक स्त्री पति और बच्चों की सीमाओं में बंध कर दिन-रात एक ही कार्य में लग जाती है। लेकिन वही एक संयुक्त परिवार में जब परिवार के सभी सदस्य साथ में रहते हैं तो कार्यों का बंटवारा हो जाता है। अलग-अलग कार्य घर के अलग-अलग सदस्य करेंगे।

और जब घर के सभी सदस्य एक साथ बैठे हैं तो घर की सभी समस्याओं पर एक साथ चर्चा करते हैं। घर के बच्चों के भविष्य को लेकर चिंताएं करते हैं। घर की उन्नति को लेकर आपस में बात करते हैं। और एक साथ हंसी, मजाक और ठहाके भी लगते हैं। तो यहां पर संयुक्त परिवार के महत्व को भी हम समझ सकते हैं। एकल परिवार होने से लगता है कि हमें जीवन जीने की आजादी मिल जाएगी लेकिन इस आजादी के चक्कर में हम सामूहिकता खुशी और तमाम गतिविधियों से दूर हो जाते हैं।

लेखक ने कहानी के माध्यम से एकल परिवार के पश्चिमी अवधारणा की भी आलोचना की है की कैसे एकल परिवार एक यांत्रिक जीवन और तमाम मानसिक विकृतियों के साथ जीवन जीता है। और कहता है कि हम प्रगतिवादी सोच के हो गए हमारी उस प्रतिवादी सोच का क्या फायदा? जब हम दिन-रात एक मशीन की भांति कार्य करें और तमाम मानसिक तनाव के साथ अपना जीवन जिए। असली जीवन तो वह है कि हम अपने परिवार के साथ हंसी-खुशी और तमाम मानसिक तनाव से दूर रहकर अपनी स्वच्छंदता के साथ जीवन को जिए।

कहानी की शुरुआत लेखक के मालती के घर पहुंचने से शुरू होती है क्योंकि लेखक बहुत दूर से मालती से मिलने के लिए उसके घर आया था। मालती लेखक दूर की बहन है लेकिन वह उसे सखी कहता है। क्योंकि दोनों ने बचपन में एक साथ खेले है और बचपन से ही परस्पर दोनों का सख्य का संबंध रहा है। लेकिन जैसे ही वह आंगन में प्रवेश करता है और आसपास के वातावरण को देखा है कि सब कुछ सुना सुना और सन्नाटा फैला हुआ है।

लेखक इस बात को महसूस करता है कि मेरे आने की मालती के अंदर कोई उत्साह नहीं है वह चुपचाप जाकर दरवाजा खोलती है और अंदर आने को बोलती है।

अभी लेखक और मालती आपस में बातचीत करते हैं। तभी उसका बच्चा रोने लगता है और उसे सब काम छोड़कर बच्चों को चुप करने चली जाती है। यहां पर लेखक ने मालती की व्यस्तता दिखाई है। जब महेश्वर अस्पताल से लौट कर आते हैं तब वह खाना खाते हैं। महेश्वर के खाना खा लेने के बाद ही मालती खाना खाती है। मालती शाम को तीन बजे खाना खाती है।

इस परिवारिक जीवन की व्यस्तता में मालती की पढ़ाई लिखाई भी छूट जाती है। यह बात जब लेखक पूछता है तो मालती बोलती है कि “यहां पढ़ने को क्या?”- गैंग्रीन

रात में वह साढ़े दस बजे भोजन करती है।

निष्कर्ष-

गैंग्रीन कहानी संस्मरणात्मक शैली में लिखी गई कहानी है। जो पाठक को विश्लेषण और सोचने लिए मजबूर करती है कि एकल परिवार में जिंदगी इस हद तक बंध जाती है कि मनुष्य एक यंत्र की भांति काम करने लगता है। खाने का समय उठने का समय कहीं पर जाने का समय आदि बंधनों में बढ़कर अपना मुक्त और स्वतंत्र जीवन खो देता है। और इसी कारण व्यक्ति के अंदर निरर्थकता बोध का भाव उत्पन्न होता है। और अपने जीवन के मूल्य और महत्व को नहीं समझ पाता।

गैंग्रीन कहानी ~सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5/

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