
एकांकी अर्थात एक अंक वाला लघु नाटक जिसमें जीवन की किसी एक विशेष घटना को कम से कम समय में तथा कम पात्रों के माध्यम से दर्शाया जाए।
दीपदान ऐसी ही शैली में लिखी ऐतिहासिक एकांकी है जो सन् 1953 में प्रकाशित हुई जिसके रचनाकार डॉ.रामकुमार वर्मा है।
कुंवर उदयसिंह(राज्य के उत्तराधिकारी)
पन्ना(धाय मां)
चंदन (पन्ना का बेटा)
सोना
बनवीर (सांगा के भाई पृथ्वीराज की दासी का पुत्र)
सामली(परिचारिका)
कीरत(झूठी पतल उठाने वाला)
एकांकी की कथा 1536 चित्तौड़ दुर्ग घटना तथा मेवाड़ राज परिवार की घटित घटनाओं पर आधारित है। महाराणा सांगा(संग्राम सिंह) जो 16वी शताब्दी के पराक्रमी राजा थे इन्होंने अपनी शक्ति के बल पर मेवाड़ साम्राज्य का विस्तार किया। महाराजा सांगा की मृत्यु के बाद उनके छोटे पुत्र कुंवर उदयसिंह राज्य के अधिकारी और राज्य के एकमात्र कुल दीपक थे।किंतु महाराणा सांगा के भाई पृथ्वीराज की दासी के पुत्र बनवीर अपने षड्यंत्र से यह राज्य सिंहासन हथियाना चाहते थे।
वह रात्रि में दीपदान का तथा नृत्य का आयोजन करके पूरे राज्य को गुमराह कर छल कपट करके किसी भी तरह कुंवर उदयसिंह को मृत्यु की शय्या पर सुलाना चाहते थे और स्वयं राज्य के उत्तराधिकारी बनने का स्वप्न देख रहे थे।परंतु कुंवर उदयसिंह की सुरक्षा की जिम्मेदारी पन्ना(धाय मां)पर आ जाती है,पन्ना को ही कुंवर के बचपन से लालन पोषण की जिम्मेदारी मिली थी अतः उनकी सुरक्षा करना उनका ही कर्तव्य था और राष्ट्रीय दायित्व भी।
पन्ना का स्नेह कुंवर उदयसिंह के प्रति बहुत अधिक था वह अपने स्वयं के पुत्र से भी ज्यादा उनका ख्याल रखती थी किंतु यह कहना उचित नहीं होगा कि उनका स्नेह चंदन के प्रति कम है। वह दोनों को एक समान प्रेम करती है। दोनों एक साथ भोजन करते है हैं ,एक साथ रहते हैं पन्ना कही भी उनमें भेद भाव की भावना उत्पन्न नहीं होने देती। चंदन उनका एकमात्र पुत्र है जिससे वह इतना स्नेह करती थी।
जिसको आंखों के सामने बड़े होते देख वह मातृस्नेह से गद- गद होती।उसी पुत्र को जब वह कुंवर उदयसिंह के बदले शैय्या पर सुला देती है तो वह इस बात से परिचित होती है कि आज जिस नींद में चंदन सोएगा उसके बाद वह उठ नहीं पाएगा,चंदन की माला जो टूट चुकी है वह अपनी मां से उसे पुनः जोड़ने के लिए कहता है लेकिन अब शायद वो माला कभी नहीं जुड़ेगी जिस तरह उस माला का जुड़ना अधूरा रह गया है उसी तरह चंदन का जीवन भी अब अधूरा रह जाएगा। वह माला चंदन के जीवन का प्रतीक है,जो पुनः नहीं जोड़ा जा सकता।
चंदन को आज नींद नहीं आ रही रह–रह कर उसका मन विचलित हो उठता है किंतु माता के निकट रहते उसे यकीन है कि कोई उसका कुछ नहीं कर सकता माता का आंचल संसार की सबसे सुरक्षित स्थान है किंतु पन्ना का धर्म मातृ स्नेह से कई ऊपर है। पन्ना चंदन को अपना गीत सुना के सुलाने की कोशिश करती है जो गीत भी पन्ना के जीवन की तरह वीरान है।
“उड़ जा रे पांखेरुआ, सांझ पड़ी।
चार पहन बाटडली जोही
मेडय खड़ी एक खड़ी।
उड़ जा रे पांखेरुआ, सांझ पड़ी।
डबडब भारया नैन दीरधड़ा।
लग गई झड़ी ए
उड़ जा रे पांखेरुआ सांझ पड़ी।।”
यहां इस गीत का आशय यह है कि शाम होते ही सारे पंछी उड़ जाते हैं और अपने घर को लौट आते हैं परन्तु यहां सांझ होने वाली है और अब तक वह पंछी घर नहीं लौटा । यहां सांझ पूरे दिन के समाप्त होने का संदेश देता है।यह केवल दिन के समाप्त होने का संदेश ही नहीं बल्कि आशाओं के समाप्त होने का भी प्रतीक है जिस तरह ये दिन समाप्त हो गया है उसी तरह अब पन्ना की आशा भी समाप्त हो गई है अब उसके जीवन में केवल अंधकार ही रह गया है।
अगली पंक्ति में स्त्री राह देखती हुई निरंतर रोई जा रही है।
यह पंक्तियां भी पन्ना के जीवन में आने वाली उदासी और एकांत को दर्शाती है।
इस गीत की प्रासंगिकता को हम फिल्म “रंग दे बसंती ” के इस गीत में देख सकते हैं –
“आजा सांझ हुई मुझे तेरी फिकर
धुंधला गयी देख मेरी नज़र आ जा न
तेरी राह ताके आंखियां
जाने कैसा कैसा होये जिया
तेरी राह ताके आंखियां
जाने कैसा कैसा होये जिया
धीरे धीरे आँगन उतरे अँधेरा
मेरा दीप कहाँ
ढलके सूरज करे इशारा
चंदा तू है कहाँ
मेरे चंदा तू है कहाँ
लुका चुप्पी बहुत हुयी
सामने आ जा ना
कहाँ कहाँ ढूंढा तुझे
थक गयी है अब तेरी माँ।।”
कुंवर उदयसिंह को तो वह सुरक्षित और चतुराई के साथ कीरत की सहायता और साहस से सुरक्षित स्थान पर भेज देती है। किंतु राज्य के दीपक को बचाने के चक्कर में वह चंदन को बनवीर के षड्यंत्र का शिकार होने देती है ताकि राज्य का कुलदीप जलता रहे
राज्य के कुलदीप को बचाते हुए वह दीपदान करती है अपने जीवन के एकलौते चिराग़ का,अपने जीवन का, स्वयं के पुत्र का ,जो सच्चे अर्थ में किया गया दीपदान है।
रामकुमार वर्मा की यह एकांकी राष्ट्रीय प्रेम तथा राष्ट्रीय दायित्व को दर्शाती है इसमें एक माता और पुत्र के प्रेम (स्नेह ) से ऊपर राष्ट्र प्रेम को बताया गया है । राष्ट्र रक्षा के लिए सर्वस्व त्यागने की प्रेरणाभाव ही एकांकी का मूल लक्ष्य और केंद्र बिंदु है।
एकांकी में लेखक की भाषा शैली सरल,सहज और प्रवाहपूर्ण है।ऐतिहासिक परिवेश के साथ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है जो पाठक वर्ग तक सीधे संप्रेषित होता है। शैली में नाटकीयता और पात्रानुकूल भाषा, ओजस्वी पूर्ण संवाद इस एकांकी को और सजीव व प्रभावशाली बनाता है ।
उदाहरण के रूप में हम पन्ना के इस संवाद को देख सकतें हैं– “राजपूतानी व्यापार नहीं करती महाराज या तो रणभूमि पर चढ़ती है या चिता पर।”
एकांकी के अंतिम हिस्से के संवाद अत्यंत संवेदनशील हैं जो किसी भी पाठक की आंखें नम कर सकते हैं।
एकांकी का शीर्षक ‘दीपदान’ कथानक से जुड़ा होने के कारण एकदम सटीक है । शीर्षक का अर्थ व्यक्तिगत त्याग का प्रतीक है। दीपदान अर्थात अंधकार में प्रकाश का प्रतीक। जिस प्रकार धाय मां ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान कर राज्य के दीपक को सुरक्षित रखतीं है यही उनका सच्चे अर्थ में दीपदान है ।
निशा मंडल
परास्नातक
हिंदी विभाग , दिल्ली विश्वविद्यालय
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