नाटो और ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध

विश्व मानचित्र पर प्रतिस्थापित देशों के बीच जो सबसे ज्वलंत और महत्वपूर्ण मसला है वह है — सुरक्षा।
हर राष्ट्र अपनी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता है और संसाधन जुटाता है। यहीं से sovereignty (संप्रभुता) के concept का जन्म होता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब विश्व में शक्ति संतुलन का नया दौर शुरू हुआ तब North Atlantic Treaty Organisation (NATO) की स्थापना हुई। यह एक सैन्य गठबंधन था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सैन्य गठबंधन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। शुरुआती दौर में यह गठबंधन सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए पश्चिमी देशों द्वारा लिया गया निर्णय था। बाद में, यह साइबर सुरक्षा, आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भी सामूहिक सुरक्षा गठबंधन के रूप में उभरा है। मूलतः 12 संस्थापक सदस्यों द्वारा स्थापित नाटो आज 32 सदस्य राष्ट्रों का गठबंधन है।

नाटो : प्रासंगिकता

जब नाटो की स्थापना हुई तब अमेरिका ने इस गठबंधन के तहत पश्चिमी देशों को सैन्य सुरक्षा प्रदान की। इस कारण यूरोप ने पारंपरिक सेना गठन पर ध्यान न देकर आर्थिक विकास पर बल दिया।
नाटो की वाशिंगटन संधि के Article 5 (अनुच्छेद 5) के अनुसार यदि नाटो के सदस्य देश पर हमला किया जाता है तो यह सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा जिसमें सामूहिक प्रतिक्रिया होगी। यह एक महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद है जिसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इस प्रकार नाटो की भूमिका, बतौर सैन्य और राजनीतिक गठबंधन, महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल ही में ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष में नाटो की भूमिका चर्चा का विषय है।

नाटो और ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध

नाटो के बजट का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अमेरिका वहन करता है। पश्चिम में अमेरिका बेहद प्रभावशाली राष्ट्र है और विश्व के सुपरपावर देशों में से एक है। वर्तमान में चल रहा ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध एक बेहद बड़ा मसला है जो विश्व राजनीति (खासकर मिडल ईस्ट) को नया मोड़ देगा। चूंकि अमेरिका इस युद्ध में शामिल है, इस स्थिति में नाटो की भूमिका अहम हो जाती है। यह भूमिका केवल सैन्य नहीं होगी, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक स्तरों पर भी दिखाई दे सकती है। इस संदर्भ में मुझे उपर्युक्त Article 5 याद आता है जो “Collective defence” अर्थात सामूहिक सुरक्षा की बात करता है।

अगर हम वर्तमान स्थिति का आकलन करें तो युद्ध एक बेहद गंभीर मोड़ पर आ चुका है। इजरायल द्वारा की गई बमबारी में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु ने ईरान को 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उसके सबसे निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। मिडिल ईस्ट में ईरान ऊर्जा संसाधनों का केंद्र है। इस बीच अमेरिका और इजराइल का ईरान के साथ युद्ध वैश्विक शक्ति संरचना के पुनर्गठन का संकेत भी हो सकता है।

अब प्रश्न आता है कि क्या नाटो इस युद्ध में शामिल होगा?

इसमें सबसे पहले मुझे यथार्थवाद (Realism) का सिद्धांत याद आता है जो कहता है विश्व राजनीति में राज्य अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। इस प्रकार नाटो के हर सदस्य देश का युद्ध में हित नहीं है। यदि उनका प्रत्यक्ष रूप से शामिल होना अहितकर है तो संभव है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से खुफिया मदद व जानकारी प्रदान करें।

दूसरी ओर, नाटो की भूमिका क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन स्थापित करने वाली भी हो सकती है। सैन्य गठबंधन हर बार युद्ध करने के लिए ही नहीं बल्कि युद्ध रोकने वाले भी साबित हो सकते हैं। मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) ऊर्जा के परिदृश्य में प्रभावशाली क्षेत्र है। इस युद्ध का लंबा खिंचना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी “ब्लैक होल” से कम नहीं होगा।
इसलिए नाटो द्वारा शांति स्थापना की कोशिश भी संभावित है।

तीसरा बिंदु जो आता है, वह है — शक्ति संतुलन का सिद्धांत।
इसका अर्थ है कि “कोई भी राज्य अत्यधिक शक्तिशाली ना बन सके, इसके लिए अन्य शक्तियां संतुलन बनाने का प्रयास करती है।” इस युद्ध के कारण ईरान ने “Strait of Hormuz” (जलडमरूमध्य) को भी बंद कर दिया है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का रास्ता है। यहां से दुनिया का करीब एक तिहाई कच्चा तेल और करीब 20% गैस का परिवहन होता है।
इन हालातों में विश्व की ऊर्जा आपूर्ति पर संकट है। यह एक बड़ा कारण हो सकता है कि नाटो मध्यस्थता करें।

यदि ईरान द्वारा अमेरिका पर परमाणु हमले के आसार होते हैं, तो अनुच्छेद 5 के सामूहिक सुरक्षा सिद्धांत के मद्देनजर नाटो सदस्य देशों की भागीदारी काफी हद तक संभावित है। यह इस युद्ध को व्यापक स्तर पर ले जाएगा। संभावित है कि यह विश्व युद्ध की श्रेणी में आ जाए।

समापन टिप्पणी

वर्तमान स्थिति आकलन के अनुसार यह संघर्ष लंबा चल सकता है। ईरान के हालिया ट्वीट ने परमाणु बम के इस्तेमाल की शंकाओं को जन्म दिया है। अमेरिका और इजराइल, ईरान में “सत्ता परिवर्तन” चाहते हैं लेकिन इराक और अफगानिस्तान के उदाहरणों से यह साफ है कि विदेशी हस्तक्षेप केवल आक्रामक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, लोकतंत्र स्थापित नहीं करते हैं।

इन परिस्थितियों में जहां वैश्विक मंच पर सभी देशों और संस्थाओं द्वारा शांति की अपील की जानी चाहिए, इसका विपरीत देखने को मिल रहा है। वैश्विक मंच पर पसरा सन्नाटा खतरे की घंटी है। युद्ध विराम के कूटनीतिक प्रयास, शांति वार्ता और मानवीय राह इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो इसके परिणामों से कोई भी अछूता नहीं रहेगा।

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