
क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे अनमोल वस्तु क्या हो सकती है? आप में से कोई कहेगा की दौलत है,घर प्रेम,धन,पद,ऐश्वर्य,पैसा – रूपया है परंतु गुलाम भारत के लिए क्या हो सकता था? 1907 ई० में प्रेमचंद (धनपत राय) ने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ शीर्षक से एक कहानी लिखकर उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर दिया।
‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न’ कहानी ‘जमाना’ पत्रिका में छपी प्रेमचंद की पहली कहानी है । यह कहानी ‘सोजे वतन ‘ कहानी संग्रह में संग्रहित है जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने जब्त कर लिया था। इस संग्रह में संग्रहित पांचो कहानियां देशभक्ति की भावना से ओत प्रोत हैं।प्रेमचंद सोजे वतन की भूमिका में लिखते हैं की हमारे मुल्क को ऐसी किताबें की असद सख्त जरूरत है जो नई नस्ल के जिगर पर वतन देश प्रेम का नक्शा जमाए।
इस कहानी के मुख्य पात्र दिलफ़िगार और दिलफ़रेब हैं। यह कहानी राष्ट्रप्रेम की कहानी है जिसका उद्देश्य भारतीयों के मन में राष्ट्र के प्रति मर मिटने की चेतना पैदा करना व स्वाधीनता संग्राम के लिए प्रेरित करना है।
इस कहानी को पढ़ते हुए चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ कि कुछ चित्र हमारे सामने खींचते हुए दिखाई देते हैं। दोनों कहानियों के कुछ भाव मिलते हैं और साथ ही दोनों कहानियों के उद्देश्य देश प्रेम से ही जुड़े हुए हैं , इनमें देश प्रेम को इंसानी प्रेम से ऊपर दिखाया गया है।
कहानी की शुरुआत एक काल्पनिक शहर ‘मीनोसवाद’ से होती है जिसमें रहने वाले एक जांबाज आशिक दिलफ़िगार को इस शहर की मल्लिका दिलफ़रेब से प्रेम है । “प्रेम विश्वास की मांग करता है” इसलिए सौंदर्य की देवी दिलफ़रेब बिना अपना दर्शन कराए दिलफ़िगार के प्रेम को साबित करवाने के लिए उसके सामने यह शर्त रख देती है कि पहले वह उसे दुनिया की सबसे अनमोल चीज लाकर दे तभी वह उसके प्रेम को सच्चा मानेगी। दिलफ़िगार परेशान है , “वह मौत की आवाज ” की तलाश में अपनी कमर कस सकता है पर उसे कोई सूझ नहीं की दुनिया की सबसे कीमती वस्तु क्या है ? और वह अपने संघर्ष के सफ़र को प्रारंभ करता है ।
एक दिन वह लोगों के एक ऐसे समूह में पहुंचता है जिसके बीचो-बीच हथकड़ी पहने हुए एक व्यक्ति को खड़ा किया गया है जिसका दिल नेकी के ख़्याल और रहम की आवाज से जरा भी परिचित न है । उसे काला चोर कहते हैं , कुछ वक्त में काले चोर को फांसी होने वाली है इसलिए उसकी दिली इच्छा है कि पास खेल रहे छोटे बच्चे से उसे मिलने दिया जाए ।
काला चोर को मृत्यु की दहलीज पर खड़े हुए छोटे बच्चे में अपना बचपन ,और नए जीवन की उम्मीद नजर आ रही है ।,इसके साथ ही उसका दिल अभी मासूम है, इस बात के लिए वह उसे गले मिलना चाहता है। उसे हंसता खेलता देखकर भावुकता के कारण काला चोर की आंखों में आंसू छलक आते हैं दिलफ़िगार की नजरों में यही आंसू ‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न ‘ है । हालांकि दिलफ़रेब इन आंसुओं का सम्मान करती है परंतु वह कहती है कि तुम्हारे भीतर बेहतर प्रेमी बनने का गुण मौजूद है ,तुम दोबारा कोशिश करो और दुनिया की सबसे अनमोल वस्तु ढूंढ कर ले आओ ।
इसके बाद दिलफ़िगार को यार के कूचे से बाहर निकाल दिया जाता है । इसके बाद दिलफ़िगार हजरते खिज्र (इस्लामी परंपरा के रहस्य में ज्ञानी हस्ती, जिन्होंने बंजर जमीन को हरा भरा कर दिया था) को याद करके उनसे मदद मांगता है कि जैसे आपने सिकंदर को आबे हयात (अमृत के समान जल) के कुएं का रास्ता दिखाया था इस प्रकार मेरा बेड़ा भी पर करो । दिलफ़िगार पागलों की तरह पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक जंगल, विरानियों और बर्फीली चोटियों पर इतना भटका कि बहुत कमजोर हो गया था ।
एक दिन उसे नदी के किनारे एक युवती सज – धज कर सिंगार करके एक चिता पर बैठी है जिसकी गोद में उसके प्यारे पति का सर है और चिता में दोनों जल रहे हैं , जब दोनों जलकर राख में बदल जाते हैं तत्पश्चात दिलफ़िगार अपने कुर्ते में यह राख रखकर दुनिया की सबसे अनमोल चीज समझता हुआ व दो प्रेमियों के सच्चे पवित्र व अमर प्रेम को मानता हुआ अपनी जीत समझकर दिलफ़रेब के महल में जाकर उसकी कलाई को चूम कर एक मुट्ठी राख को उसकी हथेली में रखकर सारी कहानी बयां करता है ।
दिलफ़रेब उस राख को आंखों से लगाकर कुछ विचार करते हुए कहती है बेशक यह राख लोहे को सोना रखने की सिफ़त रखती है परंतु यह दुनिया की सबसे अनमोल वस्तु नहीं है। इस तरह प्रेम के पुजारी को प्रेमी के गली से निकाल दिया जाता है और वह तीसरी बार नाशाद व नामुराद आशिक़ की तरह दुनिया का सबसे अनमोल रतन ना खोज पाने के बाद आत्महत्या की इरादे से पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी चढ़ गया।
वह पहाड़ की चोटी से कूदने ही वाला था कि हरे कपड़े व हरी पगड़ी बांधे एक बुजुर्ग एक हाथ में तस्बीह(माला) व दूसरे हाथ में लाठी लिए सामने आते हैं और हिम्मत न हारने की नसीहत देते हुए कहते हैं “मजबूत इरादा मोहब्बत के रास्ते की पहली मंजिल है”। बुजुर्ग दिलफ़िगार से कहते हैं कि तुम हिंदुस्तान जाओ तुम्हारी मुराद ज़रूर पूरी होगी और वे गायब हो जाते हैं ।
दिलफ़िगार शुक्रिये की नमाज पढ़ कर खुशी-खुशी पहाड़ से नीचे उतर कर हिंदुस्तान की तरफ चल पड़ा । कांटों से भरे जंगलों ,रेगिस्तानों ,पर्वत ,घाटियों को पार करके वह हिंदुस्तान की पवित्र भूमि तक पहुंचता है । वह एक नदी के किनारे लेटता है ,पास ही मैदान में भारत का एक सपूत दिखाई देता है जिसके सीने से खून का फव्वारा बह रहा है क्योंकि वह बहुत से दुश्मन सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया है और अंत में ज़ख्मी पड़ा हुआ है ।
दिलफ़िगार के पूछने पर भारत का बहादुर सिपाही अपनी कहानी बयां करके गुलामी से मुक्ति के लिए अपने प्रयास को बताता है और कहता है कि गुलाम भारत में जीने से अच्छा मैं शहीद हो जाऊं। इसके बाद वह धीरे से भारत माता की जय बोलकर शहीद हो जाता है।
दिलफ़िगार शहीद के हृदय से निकलने वाली आखिरी बूंद खून को हाथ में लेकर इस दिलेर की बहादुरी पर हैरत करता हुआ अपने वतन लौटकर दिलफ़रेब की मेहंदी वाले हाथों को चूमते हुए खून का कतरा रखकर कहानी सुनाता है । इसके बाद दिलफ़रेब हाथ जोड़कर दिलफ़िगार से बोली ऐ – जांनिसार आशिक दिलफ़िगार मेरी दुआएं बर आई और खुदा ने मेरी सुन ली तुझे कामयाब किया । आज से तू मेरा मालिक और मैं तेरी लौंडी।
निष्कर्ष-
प्रेमचंद कहानी के अंत में लिखते हैं कि “खून का आखरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे दुनिया का सबसे अनमोल चीज है”। प्रेमचंद ने यह कहानी इसलिए लिखी कि उनका उद्देश्य भारतीयों के भीतर चेतना पैदा करना था ताकि वे अंग्रेजी हुकूमत से लोहा ले सकें । प्रेमचंद ने इस कहानी में प्रेम से ऊपर राष्ट्र प्रेम को रखते हैं ।
इस कहानी की भाषा उर्दू – फारसी शब्दों के मेल से बनी है इस कहानी में मध्य-पूर्व (अरब देश ) और भारत के भौगोलिक क्षेत्रों का वर्णन किया गया है।
निशा मंडल
परास्नातक
हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
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