
कहानी कहने और सुनने की परम्परा भारतवर्ष में बहुत पहले से है। भारतीय कहानी का एक रूप कादम्बरी में मिलता है और दूसरा विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतन्त्र में। पंचतन्त्र की कहानियों में उपदेश भी है और शिक्षा भी।
कहानियाँ एक राजा के नालायक बेटों को शिक्षा देने के उद्देश्य से लिखी गयी हैं। साहित्य में कहानी आधुनिक काल की विधा है। विद्वानजन कहानी को आधुनिक विधा इसलिए मानते हैं कि उसमें आधुनिकता के तत्त्व समाहित हैं। जैसे इस लोक में कल्याण की कामना, इतिहास पर विश्वास, पारलौकिकता का निषेध आदि। गद्य भी आधुनिक काल की विधा है, जिसमे कहानी कही जाती है।
पहला चरण प्रेमचंद पूर्व युग (1901-1915)
दूसरा चरण प्रेमचंद-प्रसाद युग (1915-1935)
तीसरा चरण उत्तर प्रेमचंद युग (1336-1955)
चौथा चरण- नई कहानी (1955-1960)
कोई भी विधा जब सुचारू रूप से समाज में विद्यमान हो जाती है तो एक प्रश्न उठता है कि पहले शुरुआत कहां से हुई। इसी तरह हिंदी साहित्य में भी यह प्रश्न उठा की हिंदी की पहली कहानी का दर्जा किसको दी जाए। क्योंकि उस समय लोग और साहित्यकार अपनी-अपनी भाषा में कहानी कह और सुना रहे थे। जिससे हिंदी के प्रथम कहानी निर्धारण को लेकर विद्वानों में मतभेद है। अलग-अलग विद्वान अलग-अलग मत को लेकर पहले कहानी का निर्धारण करते हैं। लेकिन बाद में एक सर्वसम्मति बनी की जो कहानी, कहानी के कला तत्व और शिल्प जैसे कि वातावरण, भाषा, चरित्र चित्रण, कथानक आदि विषयों पर खरी उतरेगी उसे ही पहली कहानी माना जाएगा।
हिन्दी कहानी : उद्भव और विकास- सन् 1850-1900 के बीच तक उपन्यास और कहानी में भेद नहीं किया जा सका था। भारतेन्दु ने जो कुछ अपने या समाज के अनुभव को कथा रूप में लिखा जा रहा था, उसे कहानी की संज्ञा दी।
कहानी के नाम से प्रकाशित सर्व प्रथम रचना है ‘रानी केतकी की कहानी’ (1803 इंशा अल्ला खाँन)। रानी केतकी की कहानी पारसी थिएटर पर आधारित एक पूर्ण रूप से किस्सागोई कहानी है। क्योंकि इस कहानी में कहानी के जो कल तत्व है इसका अभाव है। अर्थात वातावरण, भाषा, चरित्र चित्रण, आदि कहानी तत्व रानी केतकी की कहानी में विद्यमान नहीं है। इसके बाद शिव प्रसाद सितारे हिन्द की रचना ‘राजा भोज का सपना’,राजा भोज का सपना भी एक किस्सागोई कहानी है। क्योंकि इसमें भी कहानी के तत्व पूर्ण रूप से विद्यमान नहीं है।
और एक तरह से इसे कथात्मक निबंध कहा जा सकता है। तोताराम शर्मा का ‘अद्भुत अपूर्व स्वप्न’, सदल मिश्र का ‘नासिकेतोपाख्यान’ आदि का उल्लेख कहानी के रूप में किया जाता है। परन्तु ये कथाएँ कथा की मौलिकता के अभाव में तथा शैली की अस्पष्टता के कारण विशुद्ध रूप से कहानी के क्षेत्र में नहीं आती हैं। फिर भी कहानी के विकास की प्रारम्भिक अवस्था का द्योतक हैं।
आगे चल कर सरस्वती पत्रिका के प्रकाशन के साथ (1900 ई.) हिन्दी कहानियों के क्षेत्र में नवीनता दिखायी देती है। सरस्वती से प्रकाशित किशोरी लाल गोस्वामी की रचना ‘इन्दुमती’ (1900 ई.) को हिन्दी की प्रथम कहानी होने का श्रेय प्राप्त है। इसके पश्चात् की रचनाएँ हैं- मास्टर भगवान दास की रचना ‘प्लेग की चुड़ैल’, रामचन्द्र शुक्ल की ‘ग्यारह वर्ष का समय’, बंग महिला द्वारा प्रकाशित कहानी ‘दुलाई वाला’, गिरजा दत्त बाजपेई की रचना ‘पंडित और
समीक्षा- ‘तीसरी कसम’ फणीश्वर नाथ ‘रेणु’…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%ae/
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